पुल के नीचे वकील सा’ब

शरारत करने में गोपाल पूरी तरह ‘समाजवादी’ था। शरारत
की गम्भीरता और घनत्व के लिहाज से सबको समान रूप से ‘उपकृत’ करता था। अन्तर होता था केवल शरारत की शैली पर। यह शैली सामनेवाले की उम्र के हिसाब से तय होती थी। अपने से छोटों को लड़ियाते-हड़काते तो हमउम्रों से उन्मुक्त खिलन्दड़पने से तो वरिष्ठों से पूरा लिहाज पालते हुए। शर्त यही होती कि शरारत करने काबिल बात उसकी जानकारी में आ जाए। उसकी शरारत से लोग ‘त्रस्त और मस्त’ रहते थे। जिनसे शरारत न की उन्हें शिकायत रहती - ‘गोपाल मेरी ओर देखता ही नहीं।’ जो ‘उपकृत’ हो गया वह कहता - ‘बदमाश ने आज लपेटे में ले लिया। लेकिन यार! कुछ भी कहो, मजा आ गया।’ उसकी सजा में मजा आता था और मजे के लिए लोग उसकी सजा का इन्तजार करते थे।

एक दिन बम सा’ब भी इसी दशा को प्राप्त हो गए। 

बम सा’ब मनासा के वकीलों की पहली पीढ़ी में शामिल अग्रणी वकील थे। आज से ठीक बाईस बरस पहले, 68 वर्ष की उम्र में उनका अवसान हुआ। उस जमाने में सम्भवतः सबसे मँहगे वकीलों में से एक। मनासा से दो किलोमीटर दूर बसे गाँव भाटखेड़ी के मूल निवासी बम सा’ब का पूरा नाम रतनलाल बम था। फर्राटेदार अंग्रेजी में वकालात करते थे लेकिन काला कोट उतारते ही मूल मालवी स्वरूप में आ जाते थे। तब वे हिन्दी से एक सीढ़ी नीचे उतर कर मालवी में ही बतियाते। मस्तमौला और यारबाज मिजाज के। खुलकर हँसना, ठहाके लगाना उन्हें अलग पहचान दिलाता था। उनका यह मिजाज उन्हें यथेष्ट लोकप्रिय बनाए हुए था। 

एक दिन सुबह-सुबह गोपाल, बम सा’ब के घर पहुँच गया। बगल में मुंशी की डायरी दबाए। डायरी में एक अखबार फँसा हुआ। असमय गोपाल को आया देख बम सा’ब का माथा ठनका। मूँदड़ा वकील सा’ब का मुंशी सुबह-सुबह बम वकील सा’ब की इजलास में क्यों और कैसे? लेकिन गोपाल केवल मुंशी तो था नहीं! जरूर कोई खास बात है। यह खास बात क्या हो सकती है? यह गोपाल है! कुछ भी कर सकता है। इसी उहापोह और उत्सुकता भाव से बम सा’ब ने पूछा - ‘आज हवेराँ ई हवेराँ यें कें?’ (आज सुबह-सुबह ही इधर किधर?’)

चिन्ता भाव से, नीची नजर किए, गम्भीर स्वर में गोपाल ने सवाल किया - ‘आप, वटे, पुल के नीचे कई करी रिया था?’ (आप, वहाँ, पुल के नीचे क्या कर रहे थे?)’

बम सा’ब चौंके। मानो बिजली का करण्टदार नंगा तार छू गया हो, कुछ इस तरह चिहुँक कर बोले - ‘कशो पुल?’ (कौन सा पुल?)

नजरें नीची किए, शान्त संयत स्वर में गोपाल ने जवाब दिया - ‘उई’ज, जणीके नीचे आप मल्या।’ (वही, जिसके नीचे आप मिले।)

कस्बे के नामी वकील को एक मुंशी ने सुबह-सुबह उलझा दिया। तनिक झुंझलाकर बम सा’ब ने प्रति प्रश्न किया - ‘कशो पुल ने कूण मल्यो?’ (कौन सा पुल और कौन मिला?)
पूर्वानुसार ही निस्पृह, शान्त स्वर में गोपाल का जवाब आया - ‘मने कई मालम? मल्या आप अणी वास्ते पुल की तो आप ई जाणो।’ (मुझे क्या मालूम। मिले आप। आप ही जानो कि कौन सा पुल?) 

बम सा’ब का धीरज छूट गया। तनिक डपटते हुए बोले - ‘देख! हवेराँ-हवेराँ टेम खराब मत कर। साफ-साफ वता! कशो पुल? कूण मल्यो? थार ती कणीने क्यो?’ (देख! सुबह-सुबह टाइम खराब मत कर। साफ-साफ बता! कौन सा पुल? कौन मिला? तुझसे किसने कहा?)

तनिक भी विचलित हुए बिना, बम सा’ब की चिन्ता करते हुए, नजर नीची बनाए रखते हुए पूरी विनम्रता और आदर भाव से गोपाल ने जवाब दिया - ‘टेम खराब नी करी रियो। आपकी फिकर वेईगी। अणी वास्ते अई ग्यो। पुल की तो आप जाणो, काँ के मल्या आप। और म्हारा ती के कूण? यो तो अखबार में छप्यो।’ (टाइम खराब नहीं कर रहा। आपकी फिकर हो गई। असलिए आ गया। पुल के बारे में आप जानो। मिले आप। और मुझसे कहे कौन? ये तो अखबार में छपा है।) कहते हुए गोपाल ने, बगल में दबी डायरी में खुँसा अखबार बम सा’ब के सामने फैला दिया। 

बम सा’ब ने अखबार पर नजरें दौड़ाईं। उन्हें ऐसा कुछ नजर नहीं आया जो गोपाल के सवाल से जुड़ सके। अब उन्हें गुस्सा आ गया। फटकारते हुए बोले - ‘कई देखूँ अणी में? थारा वड़ावा का फूल? अणी में तो कई नी।’ (क्या देखूँ इसमें? तेरे पुरखों के अस्थि अवशेष? इसमें तो कुछ भी नहीं?)

‘म्हारा वड़ावा का फूल नी। ध्यान ती देखो। साफ-साफ लिख्यो हे के आप पुल के नीचे मल्या।’ (मेरे पुरखों के अस्थि अवशेष नहीं। ध्यान से देखिए। साफ-साफ लिखा है कि आप पुल के नीचे मिले)’ कहते हुए गोपाल ने एक समाचार पर अंगुली टिका दी।

बम सा’ब ने समाचार देखा। दो कॉलम में छपे समाचार का शीर्षक था - ‘पुल के नीचे बम मिला’। पल भर में वकील से दुर्वासा बन गए। चेहरा लाल-भभूका हो गया। अखबार गोपाल के मुँह पर फेंक कर बोले - ‘का ऽ रे गोपाल्या? थने चोबीस ई घण्टा रोर ई रोर हूजे? हवेर देखे ने हाँज, छोटो देखे न बड़ो, थने तो बस रोर करवा को मोको मलनो चईये। चल भाग!’ (क्यों रे गोपाल! तुझे चौबीसों घण्टे मजाक ही सूझता है? सुबह हो या शाम, यह भी नहीं देखता कि किससे मजाक कर रहा है, तुझे तो बस! मजाक करने का मौका मिलना चाहिए। चल! भाग!) 

मानो गोपाल को पता था कि बम सा’ब ऐसा ही करेंगे, कहेंगे, कुछ इसी तरह, मानो खतरी कर रहा हो, पूर्व मुद्रा और स्वरों में बोला - ‘मतलब के वटे, पुल के नीचे आप नी था। आप नी मल्या वटे! यो ई ज केई रिया आप?’ (याने कि पुल के नीचे आप नहीं थे। आप नहीं मिले वहाँ। यही कह रहे हैं आप?)’ 

मानो धनुष भंग प्रसंग पर लक्ष्मण ने विश्वामित्र को ‘टी ली ली’ कहते हुए अंगूठा दिखा दिया हो, कुछ उसी दशा और मुद्रा में बम सा’ब गरजे - ‘फेर! हमज में नी अई री? जावे के लप्पड़ टिकऊँ?’ (फिर! समझ में नहीं आ रहा? जाता है कि झापट टिकाऊँ?)

विन्ध्याचल की तरह अडिग और नतनयन गोपाल ने, अखबार की घड़ी करते हुए ठण्डे स्वर में अर्जी लगाई - ‘मूँ तो जऊँगा ई ज। पण आप अखबारवारा ने नोटिस जरूर देई दो के आगे ती अणी तरे से साफ-साफ लिखे के बम को मतलब बम वकील सा’ब नी है। ताकि लोग चक्कर में नी पड़े। जदी म्हारा हरीको भण्यो-लिख्यो आदमी चक्कर में पड़ी सके तो बिचारा कम भण्या ने अंगूठा छाप तो जादा घबरई जावेगा। अबार तो मूँ ई ज आयो हूँ। पण अशो नी वे के हाँज तक म्हारा हरीका दस-बीस लोग और अई जा। वा। मूँ जई रियो। आपने तकलीफ वी। माफी दीजो। राम-राम।’ (मैं तो जाऊँगा ही। लेकिन आप अखबारवाले को नोटिस जरूर दे देना कि भविष्य में साफ-साफ लिखे कि बम का मतलब बम वकील साब नहीं है। ताकि लोग भ्रमित न हों। जब मुझ जैसा पढ़ा-लिखा आदमी भ्रमित हो गया तो बेचारे अल्प शिक्षित, निरक्षर लोग तो अधिक घबरा जाएँगे। ठीक है। अभी तो मैं जा रहा हूँ लेकिन ऐसा न हो कि शाम तक मुझ जैसे दस-बीस लोग और आ जाएँ। मैं जा रहा हूँ। आपको तकलीफ दी। माफ कर दीजिएगा। नमस्कार।)

और गोपाल उसी तरह चला आया जिस तरह गया था। मानो उसने कुछ भी नहीं कहा। कुछ भी नहीं किया। कुछ भी नहीं हुआ। उधर बम सा’ब ज्वालामुखी बने, गुस्से में काँपते बम सा’ब हतप्रभ, निरीह मुद्रा मे उसे जाते देखते रहे।  


पता नहीं, देश में कहाँ, कौन सा बम कौन से पुल के नीचे मिला होगा। लेकिन गोपाल के हत्थे चढ़कर वह बम, बम वकील साहब के लिए तो सचमुच ही मानो अणु बम बन गया। यह करिश्मा गोपाल ही कर सकता था। उसी ने किया भी। मनासा में एकमात्र वही तो था जो यह कर सकता था।

लेकिन किस्से का महत्वपूर्ण अंश अभी शेष है। बम सा’ब की मृत्यु के बाईस बरस बाद यह किस्सा मुझे कैसे मालूम हुआ? अर्जुन ने बताया कि उसी दोपहर में, खुद बम सा’ब ही बार रूम में यह किस्सा सुना रहे थे - ठहाके लगाते हुए।
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अँधेरे का समर्थन करना याने खुद अँधेरे में गुम होना

गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। लगा, घर में मौत हो गई है। कोई अपनेवाला नहीं रहा। दुःख तो बहुत हो रहा है किन्तु ताज्जुब बिलकुल ही नहीं हुआ। यह तो होना ही था। खुद गौरी ने ही अपनी यह मौत तय की थी। अपनी ही बनाई हुई सलीब पर चढ़ीं वह। गौरी जैसा दूसरा कोई नहीं हो पाएगा। उनसे बेहतर या उनसे बदतर ही होगा। लेकिन उनकी मौत से उनकी परम्परा के लेखन का सिलसिला रुकेगा नहीं। उनकी मौत, उनकी परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए खाद-पानी का काम करेगी। लेकिन गौरी की हत्या की खबर को इसके काबिल जगह देने में हमारे अखबार चूक गए। इस तरह छापा मानो अनिच्छापूर्वक छापना पड़ रहा है। खानापूर्ति की तरह छापा। लेकिन अखबारों को क्या दोष दिया जाए? बकौल लालकृष्ण आडवाणी, आपातकाल में ये (अखबार/पत्रकार) झुकने की कहने पर रेंगने लगे थे। लेकिन आज तो बिना कहे ही साष्टांग दण्डवत मुद्रा में पड़े, लहलोट हो रहे हैं। पूँजी की थैलियाँ जिनके पाँवों में बँधी हों उन्हें मुक्त भाव से उछलते-कूदते हिरणों से ईर्ष्या ही तो होगी! दासानुदास भाव से, ‘सीकरी’ की अव्यक्त इच्छाओं को साकार करना जिनके जीवन का अन्तिम मकसद बन गया हो उन्हें धारा के प्रतिकूल लोग भला कैसे सुहाएँ? गौरी का यही अपराध था। वह जनोन्मुखी पत्रकारिता कर रही थीं। कार्पोरेट घरानों के स्वामित्व के चलते भारतीय पत्रकारिता का मौजूदा स्वरूप चिन्तित जरूर करता है लेकिन चकित नहीं करता। ‘कुल-कलंक’ हर काल में बने रहते चले आए हैं। अन्तर केवल यह हुआ है कि इन्हें लहलहानेवाली अनुकूल हवाएँ आज तनिक तेजी से चल रही हैं। लेकिन यह अस्थायी दौर है। ‘यह वक्त भी नहीं रहेगा’ नहीं, नहीं ही रहेगा। 

हमारा मीडिया अब जनोन्मुखी नहीं, ‘धनदातोन्मुखी’ हो गया है। अब विज्ञापन और विज्ञापन की सम्भावना ही समाचार का आधार और औचित्य बन गए लग रहे हैं। हमें सिखाया गया था कि पाठक ही अखबार (आज की शब्दावली में मीडिया) का वास्तविक मालिक होता है। इसलिए मालिक के सरोकारों की चिन्ता अखबारों/मीडिया की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन अब पाठक/दर्शक ठेंगे पर रख दिए गए हैं। पाठकों/दर्शकों का ‘जानने का अधिकार’ छीन लिया गया है। सूरत, सीकर, पटना में हुए हजारों नहीं, लाखों लोगों के जमावड़े की, पूरे पखवाड़े चलनेवाली हड़तालों की खबरें अब ढूँढने पर भी नहीं मिलतीं। नहीं मिलती वहाँ तक तो ठीक है। लेकिन इन खबरों को जगह न देने की अपनी हरकत, अखबारों/मीडिया को रंचमात्र भी संकुचित नहीं करती। गोधरा काण्ड के दौर में कुछ अखबार ‘जन-पक्ष’ के बजाय ‘धर्मान्ध-पक्ष’ बन गए थे। लेकिन बाद में इन्हें अपनी करनी पर पछतावा हुआ था। लेकिन ऐसा होता चला आ रहा है। 1924 में गाँधी ने लिखा था - ‘‘साम्प्रदायिक दंगों के मूल में भय की मनोदशा छिपी रहती है। नैतिकताविहीन समाचार-पत्र इसका अनुचित उपयोग करते हैं और उसको अधिक उकसाकर सामुदायिक स्तर पर एक पागलपन पैदा कर देते हैं। समाचार-पत्र भविष्यवाणी करते हैं कि दंगा होने वाला है, दिल्ली में लाठियाँ और छुरियाँ सभी बिक गईं और यह खबर लोगों में असुरक्षा और घबराहट पैदा कर देती है। समाचार-पत्र यहाँ-वहाँ होने वाले दंगों की खबर छापते हैं और एक स्थान पर हिन्दुओं और दूसरे स्थान पर मुसलमानों का पक्ष लेने का आरोप पुलिस पर लगाते हैं। इन बातों को पढ़कर साधारण आदमी अस्वस्थ हो जाता है।’’

पता नहीं,  शहीद-ए-आजम भगतसिंह ने गाँधी की यह टिप्पणी पढ़ी थी या नहीं। लेकिन आज से कोई नब्बे बरस पहले, 1928 में उन्होंने लिखा था - ‘‘पत्रकारिता का व्यवसाय, जो किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था, आज बहुत ही गन्दा हो गया है। ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं, ऐसे लेखक जिनके दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त हों, बहुत कम हैं।

“अखबारों का असली कर्तव्य शिक्षा देना, लोगों की संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावना हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था। लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आँखों में खून के आँसू बहने लगते हैं और दिल से सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’’ गाँधी और भगतसिंह की ये टिप्पणियाँ हमारे अखबारों/मीडिया के मौजूदा स्वरूप को देखकर की गईं नहीं लगतीं?

अंग्रेजी राज में साहित्य और पत्रकारिता साथ-साथ चलते थे। ये दोनों कभी एक सिक्के के दो पहलू तो कभी परस्पर अनिवार्य पूरक तो कभी एक दूसरे का विस्तार अनुभव होते थे। साहित्यकार भविष्य दृष्टा होता है। सम्पादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर ने 1925 में ही अखबारों की आज की दशा का वर्णन कर दिया था। वृन्दावन में आयोजित हिन्दी सम्पादक सम्मेलन में सभापति के हैसियत से उन्होंने, ‘समाचार पत्रों का आदर्श’ शीर्षक से दिए गए व्याख्यान में, भविष्य में हिन्दी के समाचार पत्र के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा था: ‘पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पकता होगी, गम्भीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जायगी। यह सब होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे।’ सो, आज हम ऐसे ही प्राणहीन मीडिया की मनमानी भोग रहे हैं। 
लेकिन ऐसा करने के बावजूद वे सच को छुपा नहीं पा रहे। वैकल्पिक मीडिया के जरिए ‘रुई लपेटी आग’ की तरह सच सामने आ रहा है और फैलता जा रहा है। फेक न्यूज और फोटो वर्कशाप के जरिए फैलाया जा रहा झूठ मुँह की खाने लगा है। ‘द वायर’, ‘मिडिया विजिल’ जैसे माध्यमों के जरिए सच के पैरोकार अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। धु्रव राठी, विनोद दुआ जैसे लोग, जन-जन तक पहुँच रहे हैं। फेस बुक और यू ट्यूब के जरिए रवीश कुमार वहाँ तक पहुँच रहे हैं जहाँ पहुँचने की कल्पना भी गोदी मीडिया नहीं कर पा रहा। 

मीडिया को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि संवैधानिक स्वरूप में तो तीन ही स्तम्भ हैं। मीडिया को चौथा स्तम्भ तो ‘लोक’ (मासेस) ने बनाया है। किसी स्तम्भ के कमजोर होने पर कोई प्रासाद गिरता है तो सबसे पहले कमजोर स्तम्भ ही चपेट में आता है। आज मीडिया ही सबसे कमजोर पाया अनुभव होने लगा है। लेकिन यह अनुभूति ‘आसमान नहीं, धुँआ’ है।  हमारा ‘लोक’, रोटी से पहले आजादी में विश्वास रखता है। 

‘लोक’ की यह आस्था भरी ताकत और गौरी लंकेश जैसे बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे तो ‘रक्त-बीज’ बनकर, ज्वार-मक्का-गेहूँ की बालियों के दानों की तरह एक के सौ बनकर आते हैं।

अमर लेखक विष्णु प्रभाकरजी कहा करते थे - ष्एक साहित्यकार को सिर्फ यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे क्या लिखना है, बल्कि इस पर भी गम्भीरता से विचार करना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है।” यह बात हमारे सम्पादकों पर आज शब्दशः लागू होती है।

विट्ठल भाई पटेल ने कहा था -

देख न पाएँ सुबह, यह और बात है।
आवाज हमारी अँधेरे के खिलाफ है।।

हमारे मीडिया को याद दिलाना पड़ेगा कि उसकी जिम्मेदारी अँधेरे के खिलाफ है। अँधेरे का पक्ष समर्थन कर वे सबसे पहले खुद के लिए अँधेरा बुनेंगे। लेकिन याद रखें, सबसे पहले वे ही इस अँधेरे में गुम होंगे।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 07 सितम्बर 2017 को प्रकाशित)

मुसीबतों का ‘अपना घर’ याने बैंक ऑफ बड़ौदा


मेरे इस लिखे को बैंक ऑफ बड़ौदा के खिलाफ माना जाएगा जबकि हकीकत यह है कि मैं अपना घर सुधारने की कोशिश कर रहा हूँ।

अब तो यह भी याद नहीं कि इस बैंक में खाता कब खुलवाया था। लेकिन यह बात नहीं भूली जाती कि पहले ही दिन से इस बैंक में मुझे ‘घराती’ जैसा मान-सम्मान और अपनापन मिला। पहले ही दिन से मेरी खूब चिन्ता की जाती रही है। थोड़े लिखे को ज्यादा मानिएगा कि बैंकवालों का बस चले तो बैंकिंग सेवाओं के लिए मुझे घर से बाहर भी न निकले दें। अब, ऐसे में मैं इसके खिलाफ जब सोच ही नहीं सकता तो भला लिखूँगा क्या और कैसे?
मेरा खाता इस बैंक की, मेरे कस्बे की स्टेशन रोड़ स्थित शाखा में है। 

सब कुछ वैसे तो ठीक ही ठीक चल रहा है लेकिन मशीन आधारित ग्राहक सेवाएँ गए कोई तीन-चार बरसों से गड़बड़ हो रही हैं। शाखा के बाहर, मुख्य सड़क पर लगा इसका एटीएम एक बार तो इतने दिनों तक खराब रहा था कि मैं ने फेस बुक पर, अपने पन्ने पर एक पोस्टर चिपका कर लोगों से यह कर चन्दा माँगा था कि बैंक के पास इसे ठीक कराने के लिए पैसा नहीं रह गया है। तत्कालीन प्रबन्धक जैन साहब तनिक खिन्न हुए थे। फेस बुक पर लगाने से पहले मैंने वह पोस्टर औपचारिक पत्र के साथ  उन्हें भेजा था। उन्होंने तत्काल ही मेरे सामने ही ‘ऊपर’ बात कर मेरे पोस्टर का मजमून पूरा पढ़कर सुनाया था। लेकिन कुछ नहीं हुआ।

अपनी नीतियों के अनुरूप बैंक ने पूरे देश में तीन मशीनें (एटीम, रकम जमा करने की तथा पास बुक छापने की) अपनी शाखाओं में स्थापित कीं और ग्राहकों से कह दिया कि ये सेवाएँ अब मशीनों से ही प्राप्त करें। लेकिन ये मशीनेें बराबर चलती रहें इस ओर प्रबन्धन ने ध्यान देना बन्द कर दिया। मैं भली प्रकार जानता हूँ कि प्रबन्धन ने इन मशीनों का रख-रखाव निजी एजेन्सियों को दे रखा है। लेकिन अधिकांश ग्राहकों को यह नहीं पता। इसलिए, स्थानीय अधिकारी और कर्मचारी ही जन-आक्रोश झेलने को अभिशप्त हैं।

मेरे खातेवाली शाखा में तीन मशीनें लगी हुईं हैं और तीनों ही बदहाल हैं। इनका संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार है -

यह बैंक के बाहर लगा ए टी एम है। इसके सेंसर काम नहीं कर रहे। 06-06 बार अपना कार्ड लगानेके बाद भी इसमें से पैसा नहीं निकलता। हर बार ‘अनेबल टू रीड कार्ड, प्लीज इन्सर्ट एण्ड रिमूव योर कार्ड अगेन’ का सन्देश पर्दे पर आता है। ए टी एम का देखभालकर्ता (केअर टेकर) कर्मचारी भी सहायता करता है। लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिलती। वह तनिक झेंप और अत्यधिक विनम्रता से, शाखा के अन्दर लगी, रकम जमा करनेवाली मशीन (जो ए टी एम का काम भी करती है) से रकम निकालने की सलाह देता है।

यह, रकम जमा करनेवाली वही मशीन है जिसकी मदद से रकम निकालने की सलाह हम ग्राहकों को बाहर मिलती है। लेकिन यह मशीन भी मदद नहीं करती। यह भी बन्द रहती है। ‘मशीन बन्द है’ की सूचनावाला कागज प्रायः ही इस पर चिपका रहता है। गए दिनों एक ग्राहक की, जमा की जानेवाली रकम फँस गई। वह रकम उसे, आरटीजीएस के जरिए, किसी दूसरे शहर में जमा करानी थी। उसकी समस्या कैसे सुलझाई गई, यह अलग से सुनाया जानेवाला मसालेदार किस्सा है।

यह मशीन पास बुक की प्रविष्टियाँ छापती है। मुझे यह मशीन बहुत अच्छी लगती है। इसमें मुझे कुछ नहीं करना होता है। अपनी पास बुक अन्दर सरकाने भर का काम ग्राहक के जिम्मे है। उसके बाद पन्ने पलटना और जिस पन्ने से प्रविष्टियाँ छापनी हैं, वह पन्ना तलाश कर छपाई कर देना - सारे काम यह मशीन अपने आप कर देती है। इस मशीन के भरोसे, छोटे बच्चे को भी पास बुक छपवाने के लिए भेजा जा सकता है। लेकिन गए तीन महीनों से यह मशीन बन्द पड़ी है। 

ऐसे में कर्मचारियों की मुश्किल का अन्दाज आसानी से लगाया जा सकता है। कर्मचारियों की संख्या में दिन-ब-दिन होती जा रही कमी के चलते उनके लिए अपने ग्राहकों को सन्तुष्ट करना अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ग्राहकों से कर्मचारियों के निजी सम्बन्धों के कारण जन-असन्तोष सतह पर नहीं आ रहा लेकिन ‘लिहाज’ भी एक सीमा तक ही साथ देता है। 

मैंने सुझाव दिया कि इन मशीनों पर एक-एक पोस्टर चिपका दें - ‘यह मशीन बैंक की है जरूर किन्तु इसके रखरखाव की जिम्मेदारी फलाँ-फलाँ एजेन्सी की है। इसके खराब रहने की दशा में कृपया फोन नम्बर फलाँ-फलाँ पर कम्पनी से सम्पर्क करें।’ मेरा सुझाव  सबको अच्छा तो लगा किन्तु ‘आचरण संहिता’ (कोड ऑफ कण्डक्ट) के अधीन वे चाह कर भी इस पर अमल नहीं कर पा रहे।

यह समस्या केवल इस बैंक की इसी शाखा की नहीं होगी। इसी बैंक की अन्य शाखाओं और दूसरे बैंकों की भी होगी। स्थानीय स्तर पर तमाम बैंकों के कर्मचारी/अधिकारी ग्राहकों की बातों से सहमत हैं लेकिन वे यथाशक्ति, यथा सामर्थ्य सहायता करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते।

इस बैंक की इस शाखा के बहाने लिखी गई यह पोस्ट शायद कोई जिम्मेदार अधिकारी पढ़ ले और ‘कुछ’ करे, इसी उम्मीद से लिख रहा हूँ। इसकी ओर ध्यान जल्दी जाए, बैंक का प्रतीक चिह्नन (मैं नहीं जानता कि यह ‘लोगो है या ‘एम्ब्लम’ या कि ‘मोनो) सबसे ऊपर लगाने का यही मकसद है।

उम्मीद करता हूँ कि मेरी इस पोस्ट को बैंक के विरोध में अब तो नहीं ही समझा जाएगा।
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महापुरुषों के ठगोरों के बीच दीनबन्धु की तलाश

विज्ञापनों की दुनिया में जो जगह और महत्व नारी देह को हासिल है, वही जगह और महत्व भारतीय राजनीति में गरीब और गरीबी का है। जिस तरह विज्ञापन सच नहीं बोलते ठीक उसी तरह भारतीय राजनीति भी गरीब और गरीबी को छलती है। मॉडल खुश होती है कि लोग उसे देख रहे हैं लेकिन बिक्री बढ़ती है चड्डी की। इधर गरीब के कष्ट दूर करने की बात कही जाती है उधर सेठ का शुद्ध मुनाफा दुगुना हो जाता है। सच के दुत्कार और झूठ के सत्कार की यह सनातन परम्परा दिन-प्रति-दिन पुष्ट होती जा रही है। आज भी यही हो रहा है। गरीबों की बेहतरी की दुहाई दी जा रही है और नीतियाँ बनाई जा रही हैं पूँजीपतियों की सुख-सेज सजाने की।

नोटबन्दी के प्रभाव से जमा रकम का हवाला देकर भारतीय स्टेट बैंक ने बचत खातों की ब्याज दर आधा प्रतिशत घटा कर चार से साढ़े तीन प्रतिशत कर दी। लेकिनएक करोड़ रुपये और इससे अधिक की नियमित जमा रकम वाले खाताधारकों को कोई नुकसान नहीं होगा। केवल उन्हीं खाताधारकों को आय में यह कमी झेलनी पड़ेगी जिनके खातों में जमा रकम एक करोड़ रुपयों से कम है। एक निजी बैंक ने भी 50 लाख तक के जमा पर ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की कमी का दी है। भारतीय स्टेट बैंक के प्रबन्ध निदेशक रजनीश कुमार के मुताबिक 90 प्रतिशत से अधिक खातेदार एक करोड़ से कम जमा रकमवाले हैं। मेरे मुहल्ले में और मेरे लगभग हजार पॉलिसीधारकों में से एक के भी खाते में पचास लाख न तो आज जमा हैं न ही कभी हो सकेंगे। सीधा सन्देश है - कम पैसेवाला होने की सजा तो भुगतनी ही होगी। 

नीमच निवासी आरटीआई कार्यकर्ता चन्द्र शेखर गौड़ के मुताबिक 2013 से 2015 के तीन वर्षों में रेल्वे ने गर्मी के मौसम में, सामान्य किरायेवाली विशेष रेलें चला कर लोगों को राहत दी। इन रेलों ने 2999 फेरे लगाए। लेकिन दिनोंदिन बढ़ती यात्री संख्या के बावजूद 2016 और 2017 की गर्मियों में रेल्वे ने सामान्य किरायेवाली एक भी विशेष रेल नहीं चलाई। हाँ, सामान्य से डेड़ गुना तथा इससे भी अधिक मँहगे किरायेवाली समर स्पेशल और प्रीमीयम रेलें चलाईं। इन रेलों ने 614 फेरे लगाए। रेल्वे का सारा जोर ऐसी ही रेलें चलाकर अपना खजाना भरने पर रहा। लेकिन रेल्वे यहीं नहीं रुका। रेल किराए में रियायत की 64 श्रेणियाँ हैं। मँहगे किराएवाली इन विशेष रेलों में रेल्वे ने एक भी श्रेणी में किराये में रियायत नहीं दी। 

तीन महीनों से अधिक समय से मैंने अखबारों और टीवी से दूरी बना रखी है। लेकिन ‘दुखी आत्माएँ’ रोज दो-एक अखबारों के चुनिन्दा समाचार मुझे पढ़वा ही देती हैं। इन्हीं से मैंने जाना कि पहले नोटबन्दी और अब जीएसटी तथा सरकार की ऐसी ही नीतियों के कारण सूरत की चालीस प्रतिशत स्पिनिंग इकाइयाँ और कपड़ा व्यापार की 90 ‘छोटी’ दुकानें बन्द हो गईं। सूरत की ऐसी एक ‘छोटी’ दुकान मेरे कस्बे की तीन बड़ी दुकानों के बराबर है। भीलवाड़ा की कमजोर कपड़ा मिलें बन्द होती जा रही हैं। लगभग 250 इकाइयाँ बन्द हो चुकी हैं और मझौली मिलों ने कामकाज कम कर दिया है। इन सबसे जुड़े मालिक लोग निश्चिय ही प्रभावित हुए होंगे लेकिन वे सब ‘उद्यमी’/व्यापारी हैं। थोड़ी ही सही, उनके हाथ में पूँजी तो है। हाथ-पाँव मारकर आज नहीं तो कल, कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे और तब तक ढंग-ढाँग से जी ही लेंगे। लेकिन इन सारे उपक्रमों से जुड़े, रोज कुआ खोदकर पानी पीनेवाले कर्मचारियों, मजदूरों का क्या? 

चारों ओर यही तस्वीर नजर आती है। स्वास्थ्य और शिक्षा पर साल-दर-साल होती जा रही  बजट कटौती, घटता व्यापार, बढ़ती बेरोजगारी, बन्द होते जा रहे छोटे-बड़े कल-कारखाने, बाजार में बढ़ती जा रही नाणा तंगी, छोटी दुकानों को निगलती जा रही बड़ी दुकानें/मॉल, प्रतिदिन बढ़ता जा रहा किसान-आत्म हत्याओं का आँकड़ा। दसों दिशाओं में दहशत और हताशा व्याप्त है। सरकार का हर जतन घोषणा होते ही डराता है। 

शिक्षा आदमी को सजग, सावधान, कर्मठ बनाती है। लेकिन लगता है, सुनियोजित तरीके से गरीबों को शिक्षा से दूर किया जा रहा है। एक ओर तो ‘स्कूल चलें हम’ अभियान पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं लेकिन छात्र संख्या कम होने के कारण स्कूलों का विलीनीकरण हो रहा है। स्कूलों की संख्या साल-दर-साल कम होती जा रही है। गरीब बस्तियों और झोंपडपट्टियों से स्कूलों की भौगोलिक दूरी बढ़ती जा रही है। सरकारी कागजों में गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति नियमित रूप से, निर्धारित समय पर मिल रही है लेकिन बच्चों के हाथ में फूटी कौड़ी नहीं आ रही। उनके खाते में रकम जमा होने की सूचना बच्चों को मिलेै उससे पहले ही ‘मिनिमम बेलेंस’ के नाम पर पूरी रकम कट जाती है। 

मानो यह सब कम पड़ रहा हो इसलिए बची-खुची कसर ‘द कोड ऑन वेजेस 2017’ ने पूरी कर दी। दस अगस्त को लोक सभा में पेश यह अधिनियम पूरी तरह से ‘मालिक’ की चिन्ता में तैयार किया लगता है। इसके अनुसार अब घण्टों के हिसाब से मजदूरी दी जा सकेगी। अपना श्रम बेचने के लिए, सूरज उगने के साथ ही मजदूर-मण्डी में खड़े होनेवाले मजदूर को अब आधे दिन के लिए ही काम मिलेगा। जबकि उसे और उसके परिवार को भूख पूरे दिन की लगती है। बाकी आधे दिन की मजदूरी तो मिलने से रही! सो, ‘और कुछ नहीं तो दो-एक कप चाय ही मिल जाएगी’ सोच कर वह मजदूर बाकी आधे दिन बिना मजदूरी के काम करेगा। आधे दिन की मजदूरी पर अब ‘मालिक’ को पूरे दिन के लिए मजदूर मिल जाएगा।

सरकारों को वही नजर आता है जो वे देखना चाहती हैं। परदेसी मेहमानों को दिखाने के लिए उनके पास काफी-कुछ होता है। फोर्ब्स की, दुनिया के अरबपतियों की सूची के पहले सौ लोगों में चार भारतीयों की उपस्थिति देश के अनगिनत भूखे-नंगे, बेरोजगारों को ढक देती है। इन चार की अमीरी परेदसियों को भरोसा दिलाती है - भारत अमीरों का देश है। वे जान नहीं पाते कि भारत गरीबों का अमीर देश है। 

कहा जाता है कि दुनिया के तमाम महापुरुष अपने अनुयायियों से ही ठगे गए। लेकिन भारत में यह कहावत तनिक आगे बढ़ जाती है - ‘दुनिया के तमाम महापुरुष अपने अनुयायियों द्वारा ही बेचे गए।’ काँग्रेसियों ने गाँधी को बेचा। लेकिन वे ‘हीन महत्वाकांक्षी दुकानदार’ थे। सत्तर बरसों में भी गाँधी के ‘अन्तिम आदमी की चिन्ता’ के विचार को पूरी तरह नहीं बेच पाए। इसके विपरीत हमारे मौजूदा शासक अधिक आक्रामक विपणन योजनावाले, अतिमहत्वांकाक्षी, कुशल व्यापारी हैं। तीन बरसों में ही दीनदयाल उपाध्याय के ‘अन्त्योदय’ को भरपूर मुनाफे के साथ सफलतापूर्वक बेचने में कामयाब हो रहे। 

गरीब होना हमारे समाज में अभिशाप है। गरीब की सदैव मौत ही होनी  है। तय करना मुश्किल होता है कि गरीब रोज मर-मर कर जी रहा है या जी-जी कर मर रहा है। हमारी मौजूदा सरकार ‘संघ’ निर्देशित, शासित, संचालित है। ‘संघ’ भारतीय संस्कृति और भारतीयता पर अपना एकाधिकार जताता है। इसी भारतीय सस्ंकृति और भारतीयता को कवि रहीम ने उजागर करते हुए बड़ों को सूचित किया है -

दीन सबन को लगख है, दीनही लखे न कोय।
जो रहीम दीनही लखे, दीनबन्धु सम होय।।

दीनबन्धु बनने के लिए लीलाधारी, योगीराज कृष्ण को, सिंहासन से उतर कर, नंगे पाँव चल कर दरवाजे तक आना पड़ता है - सुदामा को गले लगाने के लिए। हमारे शासक ऐसा करें तभी सुदामा के दिन फिरें।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 02 सितम्बर 2017 को प्रकाशित)

पहले कंजूस...फिर सनकी और अब.....

गए ढाई-तीन बरस से मुझसे मेरी पहचान कराई जा रही है। मैं मजे ले रहा हूँ।

मुझे खबू सारे निमन्त्रण-पत्र मिलते रहते हैं। सारे निमन्त्रण-पत्र और उनके लिफाफे अच्छी गुणवत्तावाले वाले, सामान्य से तनिक मँहगे कागज पर छपे होते हैं। कुछ के तो लिफाफे भी आर्ट पेपर पर छपे होते हैं। इसके समानान्तर मेेरे पास एक तरफ छपे और एक तरफ कोरे कागज भी पर्याप्त संख्या में इकट्ठे हो जाते हैं। कागजों का उपयोग तो मैं अपने पत्रों की कार्यालय प्रति के लिए काम में ले लेता हूँ लेकिन फिर भी खूब सारे कागज बच जाते हैं। उन निमन्त्रण-पत्रों, उनके लिफाफों और कागजों को मैं रद्दी के रूप में फेंकता रहा। अपना ऐसा करना मुझे कभी भी अन्यथा नहीं लगा।

एक दिन अचानक ही मुझे लगा कि मैं यह ठीक नहीं कर रहा हूँ। पता नहीं ऐसा क्योंकर हुआ कि मुझे अज्ञेय का वह वाक्य याद आ गया जो उन्होंने एक नवोदित रचनाकार की, भूमिका लिखने हेतु मिली पाण्डुलिपि लौटाते हुए कहा था - ‘कई वृक्ष कटते हैं तब एक कागज बनता है।’ यह वाक्य याद आते ही मैंने तय कर लिया - अब इन निमन्त्रण-पत्रों, लिफाफों और कागजों का पुनर्उपयोग करूँगा।

अपने इस विचार पर मैंने तत्क्षण ही अमल शुरु कर दिया। मेरी इस ‘हरकत’ से वाकिफ होने वाला लगभग हर आदमी मुझ पर हँसा। प्रायः सबने इसे मेरी कंजूसी से जोड़ा और उलाहना दिया - ‘इतनी कंजूसी ठीक नहीं। किसके लिए बचा रहे हो?’ मैंने किसी को, कोई जवाब नहीं दिया। साल-डेड़ साल बाद मुझे ‘सनकी’ कहा जाने लगा। मैंने तब भी परवाह नहीं की और ‘अज्ञेय-आराधना’ करता रहा।

लेकिन अब, गए कुछ महीनों से तस्वीर बदलने लगी है। अब मुझे समझदार ही नहीं माना जा रहा, ‘पर्यावरण-प्रेमी’ या फिर ‘पर्यावरण-रक्षक’ जैसे विशेषणों से अलंकृत किया जाने लगा है। मुझे तब भी कोई फर्क नहीं पड़ा था। अब नहीं पड़ रहा है। मैं अपने काम में लगा हुआ हूँ और ऐसा कर-कर खुद ही खुश हो रहा हूँ। हाँ, ऐसा करके मुझे अतिरिक्त प्रसन्नता होती है। कभी-कभी मैं खुद पर ही मुग्ध भी हो जाता हूँ।
मुझे इस तरह लिफाफे मिलते हैं.......

........मैं इन्हें इस तरह बदलता हूँ। और....

.......इस तरह काम में लेता हूँ।

अभी-अभी एक मंगल प्रसंग सामने आया। उसमें अतिथियों को दी जानेवाली भेंट और नेग की (लगभग एक सौ) थैलियों पर (अतिथियों के) नामों की चिट्ठियाँ बनाने/चिपकाने की बात आई। एक सुझाव आया कि आयोजन को यादगार बनाने के लिए थैलियों पर ही छपाई करवा ली जाए। पहली ही बार में यह सुझाव स्वीकार कर लिया गया। मैंने तनिक हिचकते हुए कहा कि इस फैसले पर पुनर्विचार करें। गिनती की थैलियाँ हैं। छपाई मँहगी पडे़गी। प्रत्येक अतिथि का नाम अलग-अलग छपवानेपर तो और मँहगी पड़ेगी। हिचकते-हिचकते ही मैंने सुझाव दिया कि पूरी थैली पर छपाई कराने पर थैली बेकार हो जाएगी। लोग आयोजन को याद तो करेंगे लेकिन थैली को शायद ही वापरें। केवल चिट्ठियाँ चिपकाने पर विचार करें। अतिथि अपने नाम की चिट्ठी निकाल लेगा, प्रेमपूर्वक थैली को वापरेगा और जब भी वापरेगा तब हर बार इस आयोजन को और मेजबान को याद करेगा। मेरी बात मान ली गई। ऐसा होते ही मैंने अब तनिक हिम्मत से कहा कि मेरे पास ढेर सारे रद्दी कागज हैं। प्रिण्टर तो है ही। केवल मुझे एक मौका दें। चिट्ठियाँ मैं तैयार कर देता हूँ। एक बार देख लें। पसन्द आए तो अमल में ले लें। न पसन्द आए तो मेरी चिट्ठियाँ मेरे पास। आप अलग से छपवा लें। मैंने यह सुझाव भी दिया कि चिट्ठियों पर अतिथियों के आधिकारिक नाम लिखने के लिए बजाय उनके परिवार में बोलते नाम ही लिखे जाएँ जिससे देते समय थैली निकालने में आसानी रहेगी। मेरी ये बातें भी मान ली गईं।

मैंने अपनी सूझ-समझ के अनुसार चिट्ठियाँ बनाकर बताईं। सबने पहली ही नजर में पसन्द कर लीं। मैंने एक थैली पर चिपका कर नमूना बताया। मेरी कोशिश सर्वानुमति से स्वीकार कर ली गई। 
थैलियों पर चिपकाने के लिए तैयार की गई चिट्ठियाँ।

चिट्ठी चिपकी, नमूने की थैली।

अब मैं अपने परिचय क्षेत्र में समझदार आदमी माना जाने लगा हूँ। गोया, रद्दी ने एक रद्दी आदमी को रद्दी होने से बचा लिया।

चलते-चलते यह भी बता दूँ कि (लिफाफों के अन्दरवाले) निमन्त्रण-पत्रों को अपनी टिप्पणियाँ लिखने, घर के छुटपुट कामों की, बाजार से लाए जानेवाले सामान की सूचियाँ बनाने, अपने अन्नदाताओं (ग्राहकों) को छुटपुट सन्देश भेजने जैसे कामों में प्रयुक्त कर रहा हूँ।

जानता हूँ कि ऐसा करनेवाला मैं पहला और अनोखा आदमी नहीं हूँ। मुमकिन है कि यह सब आप बहुत पहले से ही कर रहे हों। लेकिन मुझे खुश होने का यह मौका देने में आपका क्या जाएगा?
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शरारती नहीं, वह न्यायप्रिय था

मेरा कक्षा-पाठी अर्जुन (पंजाबी) मुझे सुधारता रहता है। मुझे अच्छा लगे या बुरा, उसके ठेंगे से। उसे जो कहना होता  है, कह देता है। हमारे इलाके की कहावत उसका फार्मूला है - ‘मेरी बात का बुरा लगे तो शाम को घर जाकर आधी रोटी ज्यादा खा लेना।’ आज फिर उसने मुझे सुधारा। लेकिन आज डाँटा-डपटा नहीं। आज उसने मेरी नहीं, गोपाल की चिन्ता की। दरअसल उसने अपने दो कक्षापाठियों की चिन्ता एक साथ कर ली। अर्जनु का कहना रहा कि कल मैंने गोपाल की जो छवि पेश की वह उसके एक ही पक्ष को उजागर करती है - उसके शरारती होने की। जबकि वह केवल शरारती नहीं था। अपनी लक्षणा-व्यंजना के मामले में वह अत्यधिक न्यायप्रिय था। जिसे हँकालना होता, उसे हँकाल देता और जिसे पूजना होता, पूरी ईमानदारी से चन्दन-तिलक कर देेता। 

अर्जुन ने याद दिलाया तो मुझे यह किस्सा याद आया।

मनासा बहुत बड़ा कस्बा नहीं है। हमारे स्कूली दिनों (सत्तर के दशक) में तो और छोटा था। यही कोई पन्द्रह-सत्रह हजार की आबादीवाला। भारत विभाजन के समय कई हिन्दू पंजाबी परिवारों को मनासा में बसाया गया था। प्रायः तमाम परिवारों ने अपने पुरुषार्थ और अनवरत श्रम से वह आर्थिक हैसियत प्राप्त की जिससे समाज में ‘गणमान्य’ का दर्जा अपने आप मिल जाता है। इन्हीं में एक थे रामचन्द्रजी दुआ। दरअसल लगभग 85 वर्ष की आयु में वे अभी भी अपने भरे-पूरे परिवार के बीच स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। ‘थे’ केवल इसलिए कह रहा हूँ कि आयुवार्धक्य के कारण अब वे घर से बाहर बहुत ही कम नजर आते हैं। अर्जुन ने चेताया भी था - ‘देख! लिखते-लिखते तू कभी-कभार बहक जाता है। कोई उल्लूपना मत कर देना। वे राजी-खुशी, पोतों-पड़पोतों से खेल रहे हैं।’  आर्थिक सन्दर्भों में वे ‘जबरा आदमी’ थे। छोटे-मोटे कुबेर की हैसियतवाले। ‘रामचन्द्र कालूराम’ नाम से उनकी, कपड़ों की दुकान आज भी अपनी चिरपरिचित विश्वसनीयता और लोकप्रियता सहित कायम है। अपनी दुकान के इसी नाम की वजह से वे या तो ‘रामचन्द्र कालूराम’ के नाम से पहचाने जाते थे या फिर ‘रामचन्द्र कालूरामवाले रामचन्द्रजी’ के नाम से। 

घर से दुकान और दुकान से घर आना-जाना हो या अन्य किसी काम से कस्बे में ही कहीं आना-जाना हो, वे पदयात्री की बने रहते थे। उन्हें इसी में सुख मिलता था। उन्हें सामने आते देख, लोग, अवचेतन में व्याप्त आदरभाव से मानो अपने आप ही रास्ता छोड़ देते थे। लेकिन अपनी यह सामाजिक स्थिति उन पर क्षणांश को भी हावी नहीं हुई। वे अतिशय विनम्र भाव और आचरण से पेश आते। सामने आ रहा आदमी कौन है, उम्र में छोटा है या बड़ा, क्या करता है, उसकी हैसियत क्या है, उसने रामचन्द्रजी को देखा या नहीं, उसने नमस्कार किया या नहीं, इन सारी बातों से परे वे अपनी ओर से नमस्कार करते। केवल नमस्कार ही नहीं करते, सचमुच में झुक कर नमस्कार करते। वे सचमुच में ‘विनम्रता और शिष्टता के मानवाकार’ थे। उनकी यह विनम्रता लोगों को चौंकाती तो कभी असहज करती। वे सामनेवाले को पहले नमस्कार करने का मौका ही नहीं देते थे। मनासा में ऐसे लोग अपवादस्वरूप ही मिलेंगे जिन्होंने पहले रामचन्द्रजी को नमस्कार कर लिया हो। 

हरिद्वार स्थित भारत माता मन्दिरवाले सत्यमित्रानन्दजी गिरी उस समय भानपुरा पीठ के शंकराचार्य थे। सुदर्शन आनन, चौड़ा ललाट, होठों पर भुवनमोहिनी मुस्कान। तिस पर उनका, प्रांजल हिन्दी वाला सुस्पष्ट, ओजस्वी स्वर। वे जब प्रवचन देते तो मानो समूचे वातावरण पर किसी ने ‘मोहिनी मन्तर’ मार दिया हो। ऐसा चुम्बकीय आकर्षण कि उनके चेहरे से नजर हटाए न हटे। पूरे इलाके में उनके प्रवचन प्रायः ही होते रहते थे। मनासा के लोगों ने उन्हें इतना आदर-सम्मान, प्रेम अर्पित किया कि वे मनासा आने का कोई मौका नहीं गँवाते थे। ‘अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में’ वाला प्रार्थना-भजन सम्भवतः उन्हीं की रचना है। अपने प्रवचन का समापन वे इसी भजन से किया करते थे। इस भजन की एक पंक्ति है - ‘जो जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ जैसे/ज्यों जल में कमल का फूल रहे।’  सत्यमित्रानन्दजी ने तो यह पंक्ति भजन में प्रयुक्त की किन्तु गोपाल ने इस पंक्ति को रामचन्द्रजी के लिए ‘रिजर्व’ कर दी थी। बात हो या यह भजन गाना हो, गोपाल के बोल होते - ‘जो जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ, जैसे रामचन्द्र कालूराम रहे।’ शब्दों के बदलाव के कारण छन्द अनुशासन भंग होता और गेयता में बाधा होती लेकिन गोपाल हर बार यही करता। कभी-कभी मित्र लोग झुंझला जाते तो गोपाल सबकी झुंझलाहट से बेपरवाह कहता - ‘रामचन्द्रजी के लिए इससे ज्यादा जरूर कुछ हो सकता है लेकिन इससे कम तो कुछ हो ही नहीं सकता।’ 

गोपाल की दैहिक अनुपस्थिति में उसकी छवि-रक्षा के लिए मुझे सुधारते हुए अर्जुन जब यह सब याद दिला रहा था तो हम दोनों के गले भर्रा रहे थे। 

कल अर्जुन ने मेरे कहने पर गोपाल का फोटू भेजा था। आज रामचन्द्रजी का फोटू भी उसी ने भेजा। मेरे बिना कहे ही।

शुक्रिया अर्जुन। तुमने मेरी चूक को ही दुरुस्त नहीं किया, गोपाल का अपराधी बनने से भी मुझे बचा लिया। और हाँ! तनिक कष्ट उठाकर आदरणीय रामचन्द्रजी को मेरे सादर नमस्कार भी अर्पित करना।
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गुरु: उच्च का नहीं.......

गोपाल आज होता तो ‘धर्म गुरु’ राम रहीम के चाल-चलन और मौजूदा दशा पर क्या कहता?

गोपाल याने गोपाल आचार्य। बड़े कष्ट से कहना/लिखना पड़ रहा है - स्वर्गीय गोपाल आचार्य। हायर सेकेण्डरी का मेरा कक्षा पाठी। अपने अंचल का जाना-माना, लोकप्रिय कवि-गीतकार। पेशे से वकील लेकिन रूखी वकालात पर सरस साहित्यिकता का पुट। चेहरे पर मुस्कुराहट बसी हुई लेकिन मिजाज आड़ा-तिरछापन लिए, बाँका। ‘अभिधा’ तो मानो उसकी फितरत में रही ही नहीं। लक्षणा-व्यंजना उसकी सहचरियाँ। जैसे गणपतिजी के साथ रिद्धि-सिद्धि। ‘घुमा कर’ जवाब नहीं दिया और उसका जवाब पहली ही बार में समझ में आ गया तो फिर वह गोपाल आचार्य नहीं। शतरंज का माहिर खिलाड़ी जिस तरह सामनेवाले की छठवीं चाल भाँप कर अपनी चाल चलता है, कुछ ऐसा ही जवाब होता था गोपाल का। तय करना मुश्किल होता था कि उसकी वाक्पटुता आनन्ददायी है या आतंककारी? वह तारीफ कर गया या परिहास को लाँघकर उपहास कर गया? इस भूल-भुलैया से बाहर आकर जवाब देने के लिए सामनेवाला मुँह ऊपर करे तो मालूम पड़े कि गोपाल तो अपना काम कर अन्तर्ध्यान हो चुका। वह इतनी शालीनता, शिष्टता और नम्रता से शरारत करता कि लपेटे में आया आदमी खुद ही अश! अश!! कर उठे। उससे गुस्साए लोग मिल जाएँ लेकिन उससे नाराज शायद ही कोई मिले।

वकालात से पहले वह घनश्यामजी मूँदड़ा वकील साहब का मुंशी हुआ करता था। मूँदड़ा वकील साहब, नगर सेठ नन्दलालजी मूँदड़ा के मझले बेटे थे। नफासतपसन्द, शौकीन मिजाज के। हरफनमौला, खिलन्दड़ स्वभाव के, यारबाज, मित्र-मण्डली के मुखर, सक्रिय सदस्य। अपने से छोटों को जितना रोकते-टोकते, उतनी ही उनकी चिन्ता भी करते। मुझे नहीं पता कि गोपाल उनका मुंशी कब, कैसे बना। लेकिन गोपाल को उन्होंने शायद ही कभी मुंशी माना हो। 

दोनों का रिश्ता मुझे आज तक उलझाए हुए है। मैं यह पहेली आज तक नहीं सुलझा पाया कि ये दोनों ‘केर-बेर’ थे या एक-दूसरे के अनिवार्य, अपरिहार्य पूरक? कोर्ट के बरामदे में गोपाल अपनी मुंशी-पेटी पर डायरी रखे या कागज-पत्तर फैलाए पक्षकारों के कागज तैयार कर रहा होता और मूँदड़ा वकील साहब किसी दावे के कागज पढ़ रहे होते या फिर किसी अखबार के पन्ने पलट रहे होते। इसी व्यस्तता के बीच दोनों में कोई सम्वाद होता। असहमति होने पर दोनों, खिलाड़ी भावना से एक दूसरे को आउट कर रहे होते। गोपाल के लक्षणा-व्यंजना के घातक वार के जवाब में वकील साहब उपेक्षा भाव से, ‘पता नहीं इसे कब अक्कल आएगी’ जैसे पारम्परिक प्रति-उत्तर से पूर्ण विराम लगाते। 

लेकिन ‘धर्म गुरु’ राम रहीम को लेकर मुझे गोपाल क्यों याद आया? 

मनासा की कोर्ट, बार रूम, तहसील कार्यालय, ट्रेझरी आदि के भवन एक ही मैदान में बने हुए हैं। कस्बे के लोग, व्यापारी और (तहसील के) आसपास के गाँवों के किसान बड़ी संख्या में वहाँ बने रहते हैं। सेल्स मेन किस्म के लोग भी अपने ग्राहकों की तलाश में इधर-उधर घूमते वहाँ चले आते हैं। इसी क्रम में एक दिन एक घुमन्तू ज्योतिषी कोर्ट के बरामदों में पहुँच गया। मूँदड़ा वकील साहब की बैठक बरामदे में, सड़क की ओर किनारे पर, सबसे पहले पड़ती थी। ज्योतिषी ने शुरुआत वहीं से की। उसका अभाग्य कि वह सबसे पहले गोपाल के हत्थे चढ़ गया। अब स्थिति यह कि ज्योतिषी अपने लटकों-झटकों से गोपाल को लपेटे में लेने के लिए जी-जान से जुटा हुआ और गोपाल है कि हर बार पारे की तरह मुट्ठी से निकल-निकल जाए। दोनों के बीच, फँसाने-न फँसने का खेल चल रहा और वकील साहब ‘दोनों जाएँ भाड़ में। मुझे क्या लेना?’ की मुद्रा बनाए, अखबार में नजरें गड़ाए बैठे। लेकिन वे जैसे दीख रहे थे, वैसे थे नहीं। उनकी नजरें जरूर अखबार में थीं लेकिन उनका रोम-रोम, कान बना हुआ। बातें तो बातें, दोनों की साँसें तक सुन रहे थे। गोपाल की हथेली ज्योतिषी के सामने फैली हुई। ज्योतिषी धाराप्रवाह रूप से गोपाल का अतीत बखान रहा और भविष्य सुना रहा। गोपाल है कि मूढ़-मति बन, सपाट चेहरा लिए सब कुछ ऐसे सुन रहा मानो इस सबसे उसका कोई लेना-देना ही नहीं। भविष्य बाँचते-बाँचते ज्योतिषी ने कहा - ‘आपका गुरु उच्च का है बाबूजी!’ सुनकर गोपाल ने हथेली इस तरह खींची मानो बिजली का करण्ट लग गया हो। मुट्ठी बन्द करते हुए, ज्योतिषी को इस तरह देखा कि ज्योतिषी अकबका गया। वह समझ नहीं पाया गोपाल उस पर तरस खा रहा है या उसे ज्योतिष विद्या में फेल घोषित कर रहा है। उसकी यह हालत देख गोपाल अपने ‘मूल भाव’ में आ गया। बोलो - ‘क्या पण्डिज्जी! कैसे ज्योतिषी हो? तुम तो सामने खड़ा वर्तमान ही नहीं देख पा रहे हो। भविष्य क्या खाक बताओगे?’ ज्योतिषी रुँआसा हो गया। हताश आवाज में घिघियाया - ‘क्यों बाबूजी? ऐसा क्या हो गया जो आपने ऐसा कह दिया?’ गुरु-गम्भीर मुद्रा में गोपाल ने पहले ज्योतिषी को देखा फिर एक गहरी नजर मूँदड़ा वकील साहब पर डाली और ज्योतिषी से कहा - ‘तुम कह रहे हो कि मेरा गुरु उच्च का है। अरे! आक्खा मनासा जानता है और सब कुछ तुम्हारे सामने है। मेरा गुरु उच्च का नहीं, मेरा गुरु उचक्का है। वर्तमान तो देख नहीं पा रहे और चले हो भविष्य बताने! जाओ मारा‘ज जाओ।’

निराश, हताश, लुटा-पिटा ज्योतिषी अपना पोथी-पत्रा समेटता उससे पहले मूँदड़ा वकील साहब चिहुँके। हाथ के अखबार को तुड़ी-मुड़ी कर समेटा। खा जानेवाली नजरों से ज्योतिषी को देखा और बोले - ‘चल! भाग! दो कौड़ी की अक्कल नहीं और चला है भविष्य बताने। चल! फूट! जाने कहाँ-कहाँ से चले आते हैं।’ तब तक गोपाल ने अपनी (मुंशी की) डायरी खोल ली। दीन-विनीत भाव से वकील साहब से बोला - ‘क्या वकील सा‘ब! आप भी कहाँ फालतू लोगों के मुँह लग जाते हो! अभी नानूराम-चतराजी वाले मामले में गवाही है। आवाज लगती होगी। मैं आगे जा रहा हूँ। आप जल्दी आ जाना।’ सुन कर वकील साहब सन्न। वे कुछ कहते तब तक गोपाल अन्तर्ध्यान हो चुका था। उन्होंने आसपास देखा। कोई नहीं था। कुछ इस तरह कि मानो शून्य में विराजमान विधाता से शिकायत कर रहे हों, ‘इसके साथ काम करना मुश्किल है। पता नहीं इसे कब अक्कल आएगी।’ कहते हुए अदृष्य हो चुके गोपाल के पीछे चल दिए।

सोच रहा हूँ, आज गोपाल होता तो ‘धर्म गुरु’ राम रहीम पर वह कौन सा विशेषण चस्पा करता? कौन सी उपमा लगाता? वह जो भी करता, जो भी कहता लेकिन इतना तय है कि पहली ही बार में मेरी समझ में नहीं आता।           
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गोपाल का एक और संस्मरण यहाँ पढ़ा जा सकता है।


ये तो लगाए ही जाते हैं तोड़ने के लिए

आज थोड़ी लम्बी बात कर लेने दीजिए।

कम से कम पैंतालीस बरस पहले की बात है यह। उम्र के छब्बीसवें बरस में था। मन्दसौर में काम कर रहा था। एक शुद्ध शाकाहारी, अहिंसक परिवार का, मुझसे नौ-दस बरस छोटा एक किशोर मेरे परिचय क्षेत्र में था। प्रायः रोज ही मिलना होता था उससे। मैंने अनुभव किया कि कुछ दिनों से वह अनमना, उचाट मनःस्थिति में चल रहा है। हम लोग अच्छी-भली बात कर रहे होते कि अचानक ही उठ खड़ा होता - ‘चलूँगा भैया।’ मैं रोकता तो नहीं किन्तु लगता, मेरी किसी बात से अचानक ही खिन्न हो गया होगा। मैं अपनी कही बातों को याद करने की कोशिश करता। सब ठीक-ठाक लगता। फिर भी एक अपराध-भाव मुझे घेर लेता। ऐसा लगातार कई बार हुआ। धीरे-धीरे उसने मिलना बन्द कर दिया। मैंने गम्भीरता से नहीं लिया ध्यान ही नहीं दिया। सोचा, किसी काम में लग गया होगा। जिस तरह से मिलना बन्द किया है उसी तरह से, फुरसत मिलते ही मिलना शुरु कर देगा।

कोई तीन महीनों बाद एक दिन उसके पिता आए। मुझ पर खूब नाराज हुए। डाँट-डपट तो नहीं की किन्तु खूब उलाहने दिए। पूरी बात तो समझ नहीं पड़ी किन्तु अनुमान लगाया कि अपने बेटे के व्यवहार को लेकर दुःखी और क्रुद्ध हैं। मैंने कहा कि यदि वे मुझे अपराधी मानते हैं तो मुझे सजा दे दें लेकिन पूरी बात तो बताएँ। मेरी बात सुनकर वे एकाएक रोने लगे। रोेते-रोते ही उन्होंने बताया कि उनका बेटा मांसाहार करने लगा है। उन्हें मुझसे दोहरी शिकायत थी कि मुझसे रोज मिलने के बाद भी मैं यह बदलाव भाँप नहीं सका और यदि भाँप लिया था तो मैंने उसे ‘बिगड़ने’ से रोका क्यों नहीं। एक दिन खबर मिलने पर वे उसके अड्डे पर गए। उसे रंगे हाथों पकड़ा। वह अन्दर था। उसे बाहर बुलाया तो वह हाथ में एक हड्डी लेकर आया। यह दृष्य पिता के लिए गहरा सदमा था। उसे खरी-खोटी सुनाते हुए बोले - ‘मैं जानता था तू एक न एक दिन ऐसा करेगा।’ उसने दुगुने गुस्से से जवाब दिया - ‘जब आप जानते थे तो परेशान क्यों हुए? यहाँ आए क्यों?’ मेरे लिए भी यह पेरशान कर देनेवाली सूचना थी। मैंने बताया कि महीनों से उसने मुझसे मिलना बन्द कर रखा। उन्हें विश्वास नहीं हुआ लेकिन मेरी शकल देख कर कुछ नहीं कहा। उन्होंने कहा कि पूरे समाज में उनकी थू-थू हो रही है। मैं उसे समझाऊँ और रास्ते पर लाऊँ। मैंने कहा कि मैं वादा तो नहीं करता लेकिन खुद मुझे ही यह सब बुरा लग रहा है तो मैं उसे समझाऊँगा जरूर और अपनी तईं पूरी-पूरी कोशिश करूँगा कि वह मांसाहार छोड़ दे।

अगले दिन, अपना काम छोड़ कर उससे मिला। पूरी बात बताई और पूछा कि आखिर वह इस रास्ते पर कैसे चल पड़ा। उसने बताया कि उसके पिताजी दिन में पाँच-सात बार हिदायत देते रहते थे - ‘देख! तू रोज दो-दो, चार-चार घण्टे बाहर रहता है। पता नहीं किन-किन के साथ घूमता, उठता-बैठता है। ध्यान रखना। हमारा मुँह काला मत करवाना। बीड़ी-सिगरेट, दारू-गोश्त के चक्कर में मत पड़ जाना।’ वह कहता कि वे बेफिक्र रहें, वह ऐसा कुछ भी नहीं करेगा। उसने कहा - ‘लेकिन भैया! मैं पूछता कि इसमें बुराई क्या है? तो वे जवाब में मुझे डाँटने लगते, सवाल पूछने पर नाराज होते और कहते कि मुझे जानने-समझने की कोई जरूरत नहीं। वे कह रहे हैं इसलिए नहीं करना है। बस।’ पिता की इस बात में मुझे कोई खराबी नजर नहीं आई। मैंने कहा - ‘तो इसमें गलत क्या है? अपने को तो वैसे भी माँ-बाप का कहना मानना ही चाहिए। वे जो भी कहते हैं, हमारे भले के लिए ही कहते हैं।’ वह बोला - ‘यह तो मैं भी समझता हूँ भैया लेकिन रोज दिन में पाँच-सात बार यह सब सुन-सुन कर मेरे मन में सवाल उठने लगा कि देखना चाहिए कि आखिर बीड़ी-सिगरेट, दारू-गोश्त में आखिर ऐसा है क्या कि बाबूजी बार-बार टोकते हैं। और भैया! इसी चक्कर में मैं यह करने लगा। पहली सिगरेट पी तो जोर की खाँसी आई। इतनी जोर से कि मेरी साँस घुटने लगी। लगा कि आज तो जान गई। बस! उसके बाद कभी सिगरेट पीने का विचार ही नहीं आया। इसी तरह गोश्त खाना शुरु  किया। अभी दो-तीन बार ही खाया है। मुझे तो अच्छा नहीं लगा। जिस दिन बाबूजी ने पकड़ा उस दिन ही सोच रखा था कि अब आज से नहीं खाना है। वे कुछ नहीं कहते तो भी मुझे तो छोड़ना ही था। उसी दिन से छोड़ भी दिया है।’ मैंने कहा - ‘अपनी मन-मर्जी से यह सब कर लिया। कम से कम एक बार मुझसे भी तो बात करता!’ वह बोला - ‘सोचा तो था लेकिन लगा कि आप भी डाँट देंगे।’ अब मेरे लिए कहने-सुनने को कुछ भी नहीं बचा था। उसे समझाया कि ये बातें वह अपने पिताजी को इसी तरह बता दे। उन्हें अच्छा लगेगा। उसने ऐसा ही किया भी। सब कुछ पटरी पर आ गया। उसके पिताजी आकर मुझे असीस गए।

यह कोई तीस बरस पहले की बात है। मेरा बड़ा बेटा वल्कल  (शायद) तीसरी कक्षा में पढ़ता था। एक दिन उसने अचानक ही पूछा - ‘पापा! अपन अण्डे क्यों नहीं खाते?’ मैंने अनुमान लगाया कि उसके सहपाठी अपने टिफिन में अण्डे लाते होंगे। वह उन्हें खाते देखता होगा। इसीलिए उसने यह सवाल किया। पूछने पर उसने मेरे अनुमान की पुष्टि की। मैंने उसे अपनी समझ के अनुसार विस्तार से समझाया। पूरी बात सुनकर वह बिना कुछ कहे उठने लगा। मैंने उसे रोका और कहा - ‘लेकिन तेरा मन हो तो खा लेना। लेकिन ऐसा करने की बात सबसे पहले तेरी मम्मी को और मुझे बताना।’ उसने वादा किया। अभी वह अड़तीसवें बरस में चल रहा है। विभिन्न आई टी कम्पनियों में काम करते हुए त्रिवेन्द्रम, चैन्नई, हैदराबाद, इन्दौर, मुम्बई, पुणे जैसे महानगरों में निवास कर चुका है। मैं उसे यदा-कदा पूछता रहता हूँ - ‘अण्डा शुरु किया?’ वह मुस्कुराते हुए कहता है - ‘अभी तक तो नहीं। करूँगा तो सबसे पहले मम्मी को और आपको बताऊँगा।’ विश्वास करता  हूँ कि वह सच ही बोल रहा होगा।

मेरे छोटे भतीजे गोर्की और बहू मीरु (नीरजा) ने प्रेम विवाह किया है। यह अन्तरधर्मी तो नहीं लेकिन अन्तर्जातीय विवाह है। मेरी माँ और पिताजी इसके लिए बिलकुल ही तैयार नहीं थे। दादा (श्री बालकवि बैरागी) धर्म संकट में थे। वे माता-पिता और बेटे के बीच फँस गए थे। हमारा परिवार घोर पारम्परिक। उस पर तुर्रा यह कि पिताजी अपने इलाके में बैरागियों के महन्त। दादा ने बई-दा‘जी (हम अपने माता-पिता को इन्हीं सम्बोधनों से पुकारते थे) से कहा कि वे दोनों बच्चों को समझाने की कोशिश करेंगे। गोर्की उस समय बीस-इक्कीस बरस का था और मीरू पन्द्रह-सोलह बरस की। दादा ने पहले गोर्की से बात की। उसने कहा कि परिवार यदि सहमत नहीं है तो वह भी यह शादी नहीं करेगा। लेकिन फिर उससे कोई शादी की बात न करे। वह शादी करेगा ही नहीं। करेगा तो मीरू से नहीं तो आजीवन कुँवारा रहेगा। सुन कर दादा निरुत्तर हो गए। कुछ दिनों बाद वे मीरू से मिले। पहले तो समझाया फिर, अन्तिम कोशिश की तरह कहा - ‘ऐसा तुमने उस उल्लू के पट्ठे में क्या देख लिया जो उस पर मरी जा रही हो?’ मीरू ने लापरवाही से कहा - ‘अरे अंकल! यह जानने के लिए तो आपको, गोर्की को, नीरजा लाल की नजरों से देखना पड़ेगा।’ सरस्वती पुत्र पुकारे जानेवाला, मालवी का राजकुमार, शब्दों का धनी, तालियों की गड़गड़ाहट से मंचों का लूटनेवाला, राष्ट्रीय स्तर का एक लोकप्रिय कवि मुँह बाये उस ‘प्रेम पगी’ किशोरी को देखता रह गया। पहले तो सम्पट ही नहीं बँधी। कुछ क्षणों बाद उनका कवि मन इस उत्तर पर निहाल हो गया। फिर भी उन्होंने एक कोशिश और की - ‘तुम अभी नाबालिग हो। कम से कम दो-ढाई बरस तक इन्तजार करना पड़ेगा। कर लोगी?’ अपने सपनों में गुम उस किशोरी ने उसी लापरवाही से कहा - ‘अंकल! आप बेफिकर रहिए। दो-ढाई बरस तो क्या, गोर्की के लिए तो जनमों तक इन्तजार कर लूँगी।’ और दादा ने हथियार डाल दिए। यह जनवरी 1980 की बात होगी। जहाँ तक मेरी याददाश्त काम कर रही है, दोनों का ब्याह कोई ढाई बरस बाद, 21 जून 1983 को हो पाया। आज दादा परपोतियों को खेला रहे हैं,  मीरू-गोर्की, नाना-नानी बनने की राह पर हैं। जब भी पूरा कुनबा जुटता है तो ये बातें याद कर-कर सब खिलखिलाते हैं।

गोर्की और मीरू अपनी बेटियों मीकू (अभिसार) (एकदम बाँये) और माही (अनमोल) (एकदम दाहिने) के साथ

ये बातें अचानक ही और बिना कारण, बिना प्रसंग याद नहीं आईं। मालूम हुआ कि भोपाल की हिन्दू उत्सव समिति ने निर्णय लिया है कि नवरात्रि में होनेवाले गरबों में प्रवेश के लिए आधार कार्ड दिखाना जरूरी कर दिया है। समिति का मानना है कि गैर हिन्दू लोग ऐसे उत्सवों में हिन्दू लड़कियों को लुभाने के लिए आते हैं। इस स्थिति से (हिन्दू लड़कियों को बचाने) निपटने के लिए समिति ने यह रास्ता निकाला। इतना ही नहीं, जिला प्रशासन द्वारा बुलाई गई शान्ति समिति की बैठक में भी समिति ने प्रस्ताव रखा कि तमाम गरबा मण्डलों के पाण्डालों भी प्रवेश के लिए यही व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

मुझे याद आया, इन्दौर में भी कुछ गरबा समितियों ने गैर हिन्दू लोगों के प्रवेश से रोकने की व्यवस्था की थी। नहीं पता कि यह व्यवस्था अब भी जारी है या नहीं। और यह भी अब तक प्रकट नहीं किया गया है कि अन्तरधर्मी विवाहों पर इसका कितना प्रभाव हुआ है। इसके विपरीत, अन्तरधर्मी-अन्तर्जातीय प्रेमियों के, घर से चुपचाप चले जाने के समाचार लगभग गत वर्षों के समान ही आ रहे हैं।

भोपाल के समाचार ने यह सब याद दिला दिया। मुझे विश्वास है कि यह प्रतिबन्ध लगानेवाले लोग भी ‘प्रेम पीड़ित’ रहे ही होंगे। न रहे हों तो वे इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि प्रेम का कीट उन पर हमला नहीं कर पाया। लेकिन इतना तो निश्चित ही कहा जा सकता है कि भविष्य में भी ऐसा न होने की खातरी वे शायद ही दे सकें।

प्रेम अजीब शै है। इसकी न तो परिभाषा अब तक की जा सकी है न ही व्याख्या। सबके अपने-अपने अनुभव हैं। यह सौ टका समानतावादी है। धर्म, जात, वर्ण, वर्ग किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करता। पता ही नहीं चलता कि इसकी गन्ध कब लपेटे में लेकर मद-मस्त कर गई। इसका कीड़ा कब काट गया। मालूम होता है तब तक दुनिया बदल चुकी होती है। रोम-रोम महबूब के साथ रहने को मचल रहा होता है। आदमी न तो पागल होता है न ही सन्निपात का रोगी। वह दीवाना हो जाता है। दुनियादारी की बातें, इस तरह से उड़ जाती है जैसे तपते तवे पर पड़ पानी की बूँद छन्न से भाप बन जाती है। कृष्ण के कहने पर गापियों को ईश आराधना की सलाह देनेे गए उद्धव मूक हो गए गोपियों की बात सुन - ‘ऊधौ! मन न भए दस-बीस। एक हुतो ऊ गयो स्याम संग। कौन आराधे ईस?’ तत्व ज्ञानी होने का दर्प पाले उद्धव, प्रेम मगन गोपियों के सामने नतमस्तक हो गए। 

सुगन्ध को मुट्ठियों में कैद नहीं किया जा सकता। शरीर को कैद किया जा सकता है लेकिन मन को कैद करना आज तक मुमकिन नहीं हो पाया है। खुशबू के झोंके को कौन सी दीवारें रोक पाई हैं? इत्र की छोटी सी  शीशी, विशाल प्रासाद के एक कमरे के कोने में खुलती है तो पूरा प्रासाद महमह कर उठता है। इश्क और मुश्क तो छुपाए न छुपे। 

ऐसे निषेध आरोपित कर वाहवाही लूटी जा सकती है। खुद की पीठ ठोकी जा सकती है। लेकिन इतिहास गवाह है, प्रेम ऐसे तमाम निषेधों, ऐसी तमाम पाबन्दियों को नटखट बच्चे की तरह, टिली ली ली कहता, अँगूठा दिखाता ‘यह जा, वह जा’ हो जाता है। प्रेम से बडा कोई धर्म नहीं होता। और वह धर्म, धर्म नहीं जो प्रेम को अपराध माने। प्रेम तो मनुष्‍य को ईश्‍वर का अनुपम उपहार है। प्रेम तो प्रकृति है। बकौल कबीर, 'प्रेम न खेती नीपजै, प्रेम न हाट बिकाय।'  इसे अस्‍वीकार करना, इसका निरादर करना  ईश्‍वर का अपमान ही नहीं, ईश्‍वर को अस्‍वीकार करना है। 

निषेध सदैव ललचाते हैं। आकर्षित करते हैं। मनुष्‍य मन को उकसाते हैं। जिज्ञासु बनाते हैं। प्रेरित करते हैं। तोड़े जाने के लिए। प्रत्येक युग में।
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सरकारी आदेश का पालन: जैसा तूने गाया, वैसा मैंने बजाया

यह घटना इसी रविवार, तेरह अगस्त की है। यह घटना मुझे इसके नायक ने आमने-समाने बैठकर सुनाई है। वास्तविकता मुझे बिलकुल ही नहीं मालूम।

इस घटना का नायक मध्य प्रदेश सरकार के, ग्रामीण सेवाओं से जुड़े विभाग का कर्मचारी है। उसके जिम्मे 19 गाँवों का प्रभार है। प्रदेश सरकार ने इस विभाग के सभी अधिकारियों, कर्मचारियों को एक-एक सिम दे दी है। इनके लिए एण्ड्राइड फोन अनिवार्य है। सबको वाट्स एप से जोड़ दिया गया है और कह दिया गया है कि वाट्स एप पर मिले सन्देश को राज्य सरकार का औपचारिक और आधिकारिक आदेश माना जाए। इस आख्यान का नायक भी ऐसा ही एक सिम/मोबाइलधारी कर्मचारी है।

इस नायक की ससुराल इसके कार्यस्थल से लगभग नब्बे किलो मीटर दूर है। इसके साले का रिश्ता लेकर मेहमान, तेरह अगस्त रविवार को इसके ससुराल पहुँचे थे। नायक अपनी ससुराल में सबसे बड़ा दामाद है। इस प्रसंग पर इसे पहुँचना ही था। सब कुछ पहले से तय था। अपने नियन्त्रक अधिकारी को सूचित कर और अनुमति लेकर कथा-नायक उस दिन अपनी सुसराल में था। दोपहर, भोजन के बाद सब लोग विश्राम मुद्रा में चर्चारत थे। अपराह्न लगभग साढ़े चार बजे वाट्स एप पर सन्देश आया - प्रदेश के मुख्य मन्त्री शाम छः से साढ़े छः बजे के बीच प्रदेश के किसानों को टेलिविजन पर सम्बोधित करेंगे। समस्त प्रभारी अपने-अपने प्रभार के समस्त गाँवों के किसानों को यह सन्देश सुनना/देखना सुनिश्चित कर शाम सात बजे तक सूचित करें कि किस-किस गाँव में कितने-कितने किसानों ने यह सन्देश देखा/सुना। 

सन्देश पाकर हमारा यह नायक परेशान हो गया। उसने तत्काल अपने नियन्त्रक अधिकारी से बात की। अपनी स्थिति बताई और पूछा - ‘सर! आप ही बताईये! क्या करूँ?’ अधिकारी को भी सन्देश मिल चुका था। उसे अनुमान था कि इस कथा-नायक का फोन आएगा ही आएगा। अधिकारी ने कहा - ‘परेशान मत होओ। तसल्ली से अपना काम निपटाओ। अपने प्रभार के सारे गाँवों के नाम तो तुम्हें याद हैं ही। अभी तुम्हारे पास बहुत समय है। गाँव-वार आँकड़े तैयार कर लो। गाँवों की और किसानों की संख्या जरा कम बताना। ठीक सात बजे आँकड़े मत भेज देना। सात दस या सवा सात पर भेजना।’ कथा-नायक को राहत और खुशी तो हुई लेकिन निश्चिन्त नहीं हो सका। पूछा - ‘लेकिन सर! कहीं ऐसा तो नहीं कि दो घण्टे बाद फोटू या रेकार्डिंग भेजने का मेसेज आ जाए? ऐसा हो गया तो मैं तो मर जाऊँगा सर! आप भी नहीं बचा पाएँगे।’ अफसर ने ढाढस बँधाया - ‘उसकी चिन्ता मत करो। नहीं माँगेंगे। मैंने तलाश कर लिया है। और माँगें तो तुम मेरा नाम बता देना। कह देना कि तुमने मुझे दे दिए हैं। मैं निपट लूँगा।’

हमारे कथा-नायक ने अपने नियन्त्रक अधिकारी को रुँधे कण्ठ से बार-बार धन्यवाद दिया। अधिकारी के कहे अनुसार अपने प्रभार के गाँवों के आँकड़े भेज दिए। लेकिन उस रात वह सो नहीं सका। नींद बार-बार उचटती रही। जब भी मोबाइल पर नोटिफिकेशन की ‘टूँ-टूँ’ हुई, वह दहशतजदा होता रहा। उसे लगता रहा कि मुख्यमन्त्री का सन्देश सुन/देख रहे किसानों के फोटू/रेकार्डिंग भेजने का सन्देश आ गया है। सुबह होते-होते उसे नींद आ पाई। 

तीन दिन बाद, अब जाकर वह बेफिक्र हुआ। अपने नियन्त्रक अधिकारी के बंगले पर ‘थैंक्स गिविंग सेरेमनी’ सम्पन्न कर लौटते हुए मेरे पास आया है। दुनिया का सर्वाधिक सन्तुष्ट, प्रसन्न और निश्चिन्त प्राणी लग रहा है।

प्रदेश के, उसके जैसे तमाम ग्राम-प्रभारियों ने ऐसी ही निष्ठा, लगन और कुशलता से कर्तव्य निर्वहन किया होगा। आँकड़े पा कर मुख्यमन्त्री गद् गद हुए होंगे। भेज कर हमारा कथा-नायक तो गद् गद है ही।
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........और इस तरह उल्टा लटका दिया कलेक्टरों को

(मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान की, कलेक्टरों को उल्टा लटकाने की चेतावनी को कलेक्टरों ने किस तरह चुटकुला माना था, इसका जिक्र मैंने अपनी इस पोस्ट में किया था। कलेक्टरों का सोचना कितना सच था, यह चेतावनी दिए जाने के एक पखवाड़े से भी कम समय में, इस पन्द्रह अगस्त को ही साबित हो गया।  लोकतन्त्र में ‘लोक’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा, अवहेलना मुझे सदैव ही उद्वेलित करती है। ‘लोक’ और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर ‘तन्त्र’ का ‘नियन्त्रक’ की सीमा तक हावी हो जाना मुझे ‘लोकतन्त्र की हत्या’ लगता है। अपनी ये भावनाएँ प्रकट करने का कोई मौका मैं कभी नहीं छोड़ता। इस मामले में ‘बड़े’ अखबारों की चुप्पी मुझे सदैव ही हतप्रभ करती है। वैसे भी मेरी यह धारणा दिन-प्रति-दिन पुष्ट होती जा रही है कि ‘गोदी मीडिया’ बन चुके बड़े अखबारों के मुकाबले जिला, तहसील स्तर पर निकल रहे ‘छोटे अखबार’ अनायास ही ‘बड़ी खबरें’ छाप देते हैं। ‘छोटे अखबार में बड़ी खबर’ का ऐसा ही एक उदाहरण मुझे अभी-अभी, सत्रह अगस्त को देखने को मिला। रतलाम से प्रकाशित हो रहे ‘साप्ताहिक उपग्रह’ के स्वाधीनता दिवस विशेषांक के अन्तिम पन्ने पर प्रकाशित समाचार मुझे मेरी भावनाओं और मिजाज के अनुकूल पाया। अखबार को तो बधाई दी ही, सम्वाददाता का नाम पूछकर उसे भी बधाई दी। यहाँ, प्रकाशित समाचार की स्केन प्रति तो दे ही रहा हूँ, अच्छी बात, अच्छे काम और अच्छे आदमी की सराहना करने की भावना के अधीन, सम्वाददाता अरुण त्रिपाठी (मोबाइल नम्‍बर 94253 65004) का चित्र भी दे रहा हूँ। सुविधा मिल जाने के कारण वाक्य रचना और वैयाकरणिक चूकों को सुधारने की यथा समझ कोशिश कर ली है।) 

मध्य प्रदेश में जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़े नौकरशाह

रतलाम। प्रदेश में वैसे तो आए दिन नौकरशाही हावी होने के मामले सामने आते रहते हैं, लेकिन इस बार तो आजादी का पर्व उसी का शिकार हो गया। प्रोटोकाल याने सरकारी कार्य व्यवहार-समुचित प्रक्रिया का मखौल उड़ाते हुए सरकारी तन्त्र ने जिला स्तर के स्वाधीनता दिवस के मुख्य कार्यक्रमों में कलेक्टरों से तिरंगा फहरवाया, जबकि अधिकांश जिलों में प्रोटोकाल के मुताबिक कई जनप्रतिनिधि उपलब्ध थे। राजनीतिक दृष्टि से भी सरकार को कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि पिछले डेढ़-दो साल से वह जनप्रतिनिधियों को सम्मान दे रही थी। चुनावी साल से ठीक पहले नौकरशाहों की इस करतूत के कई मायने निकाले जा रहे हैं। 

आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस बार स्वतन्त्रता दिवस पर प्रदेश के 21 जिलों में कलेक्टरों ने तिरंगा फहराया। इन जिलों में धार, खरगोन, झाबुआ, रतलाम, शाजापुर, मन्दसौर, नीमच, गुना, अशोक नगर, श्योपुर, सिंगरौली, अनूपपुर, टीकमगढ़, हरदा, बैतूल, नरसिंहपुर, बालाघाट, डिण्डोरी, मण्डला, अलीराजपुर, शहडोल जिले शामिल हैं। विडम्बना है कि इनमें से अधिकांश जिलों में पिछले गणतन्त्र दिवस और स्वतन्त्रता दिवस पर जिला पंचायत अध्यक्षों अथवा प्रभारी मन्त्रियों ने झण्डावन्दन किया था। इस बार भी शासन ने प्रभारी मन्त्रियों के कार्यक्रमों में भी फेरबदल किया गया। पहले उन्हें उनके प्रभार वाले जिलों में भेजा जाना तय हुआ, फिर गृह जिलों में तिरंगा फहराने का तोहफा दे दिया गया। आश्चर्य इस बात का है कि जिन जिलों में कलेक्टरों ने झण्डावन्दन किया, उनमें से अधिकांश में प्रोटोकाल के वरीयता क्रम अनुसार कलेक्टर से कई ऊँची वरीयता रखने वाले जनप्रतिनिधि मौजूद थे। राजनीतिक कारणों से यदि विधायकों और सांसदों को मौका नहीं दिया जा सकता था तो मन्त्री का दर्जा प्राप्त जनप्रतिनिधियों को मौका देकर इस स्थिति को सम्हाल सकता था। लेकिन भोपाल में बैठे नौकरशाहों ने  प्रोटोकाल को ताक में रखकर जनप्रतिनिधियों को सम्मान देने के बजाय जिलों में पदस्थ अफसरों को परेड की सलामी दिलवा दी। 
यह है प्रोटोकाल-क्रम
मध्य प्रदेश राजपत्र के 23 दिसम्बर 2011 के प्रकाशन में सामान्य प्रशासन विभाग ने पूर्व की सभी अधिसूचनाओं को शामिल करते हुए विशिष्ट व्यक्तियों की श्रेणी और पद के सम्बन्ध में पूर्वता क्रम दर्शाने वाली सूची प्रकाशित की है। इसके मुताबिक सूची में कलेक्टर का स्थान 34 वाँ है जबकि सांसद, विधायक, महापौर तथा राज्य मन्त्री के समकक्ष हैसियत रखने वाले निर्वाचित व्यक्ति को 24वाँ स्थान दिया गया है। भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा 19 नवम्बर 2014 को प्रशासन तथा सांसद-विधायकों के बीच सरकारी कार्य-व्यवहार-समुचित प्रक्रिया के पालन के सम्बन्ध में पत्र जारी किया गया है। इसमें देश के लोकतान्त्रिक ढाँचे में सांसदों और विधायकों का महत्वपूर्ण स्थान बताते हुए उन्हें सम्मान देने के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश दिए गए है। इस पत्र में सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों को दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए पाबन्द किया गया है। इस लिहाज से कलेक्टर (जिसे स्वयम् जनप्रतिनिधियों का सम्मान सुनिश्चित करना है) यदि खुद ही मुख्य अतिथि बन गया, तो जनप्रतिनिधियों कौन  पूछेगा?

प्रोटोकॉल को चिढ़ाती रतलाम की बानगी
स्वाधीनता दिवस पर रतलाम का मुख्य समारोह पूरे प्रदेश की हकीकत बयाँ करने के लिए काफी है। इस समारोह में शासन के निर्देशानुसार कलेक्टर ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। समारोह में महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष और राज्य कृषक आयोग अध्यक्ष उपस्थित रहे। इससे पूर्व रतलाम में पिछले दो अवसरों पर जिला पंचायत अध्यक्ष और एक बार खुद मुख्यमन्त्री ने झण्डावन्दन किया है। प्रोटोकाल के अनुसार रतलाम में कलेक्टर से वरीयता क्रम से ऊँचा स्थान रखने वाले कई लोग हैं। महापौर, जिला पंचायत अध्यक्ष, राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष और राज्य कृषक आयोग अध्यक्ष के अलावा राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष का पद भी रतलाम को मिला है, जो वरीयता क्रम में मुख्यमन्त्री के साथ 8वें नम्बर पर ही है। नौकरशाहों ने इन सभी को नजरअन्दाज कर दिया। आगामी साल में विधानसभा के चुनाव होना हैं। ऐसी स्थिति में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कई अर्थ निकाले जा रहे है। इस एक मुद्दे से यह भी जाहिर हो गया कि सरकार नौकरशाहों की लगाम कसने के कितने ही दावे करे, लेकिन असल में वह स्वाधीनता दिवस पर भी नौकरशाहों के ही अधीन थी। 
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चीनी सामान का बहिष्कार याने रुई लपेटी आग

देश में इन दिनों उग्र राष्ट्रवाद और कट्टर धर्मान्धता की अफीम का समन्दर ठाठें मार रहा है। भ्रष्टाचार और कालेधन का खात्मा न होना, बढ़ती बेरोजगारी, स्कूलों-कॉलेजों में दिन-प्रति-दिन कम होते जा रहे शिक्षक, घटती जा रही चिकित्सा सुविधाएँ, किसानों की बढ़ती आत्महत्याएँ जैसे मूल मुद्दे परे धकेल दिए गए हैं। असहमत लोगों को देशद्रोही घोेषित करना और विधर्मियों का खात्मा मानो जीवन लक्ष्य बन गया है।

लेकिन सब लोगों को थोड़ी देर के लिए मूर्ख बनाया जा सकता है। कुछ लोगों को पूरे समय मूर्ख बनाए रखा जा सकता है। किन्तु सब लोगों को पूरे समय मूर्ख नहीं बनाए रखा जा सकता। 

जून और जुलाई के पूरे दो महीने मैं फेस बुक से दूर रहा। गए कुछ दिनों से सरसरी तौर पर देखना शुरु किया। इसी क्रम में राजेश कुमार पाण्डेय की एक पोस्ट नजर आई। घटना सम्भवतः बस्ती (उत्तर प्रदेश) की है। यह पोस्ट मैंने भी साझा की। उसके तीन स्क्रीन शॉट यहाँ दे रहा हूँ। इनमें पूरी पोस्ट पढ़ी जा सकती है। सारी बात अपने आप में स्पष्ट है। अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।



लोग समझ तो शुरु से रहे थे और समझ रहे हैं लेकिन बोल कोई नहीं रहा था। अब लोगों ने बोलना शुरु कर दिया है। लोग ही क्यों? बोलना तो भाजपा सांसदों ने भी शुरु कर दिया है। यह अलग बात है कि वे चुप रह कर बोल रहे हैं। संसद के सदनों में अपने सांसदों की अनुपस्थिति से खिन्न प्रधान मन्त्री मोदी दो-दो बार उन्हें चेतावनी दे चुके लेकिन अनुपस्थिति का क्रम बना रहा। स्थिति यहाँ तक आ गई कि मोदी को धमकी देनी पड़ी - ‘2019 में देख लूँगा।’

यह सब देख-देख कबीर का एक दोहा बरबस ही याद आ गया। कबीरदासजी से क्षमा याचना सहित, उसमें ‘पाप’ को विस्थापित कर, ‘साँच’ का उपयोग कर रहा हूँ -

साँच छुपाए ना छुपे, छुपे तो मोटा भाग।
दाबी-दूबी ना रहे, रुई लपेटी आग।।

सच सामने आ रहा है। सच हमेशा ताकत देता है। इसी का असर है कि सच लोगों की जबान और सर पर चढ़कर बोलने लगा है। 

सत्य तो सनातन से परीक्षित है। झूठ को ही खुद को साबित करना पड़ता है। परास्त तो अन्ततः झूठ को ही होना है। तब तक सत्य को छोटे-छोटे संकट झेलते रहने पड़ेंगे।
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सेंसरशिप का अनूठा वैश्विक कीर्तिमान








आज सुबह लगभग सवा दस/साढ़े दस बजे मैंने यह पोस्ट लगाई थी। किन्तु थोड़ी ही देर बाद मैंने अनुभव किया कि यह पूर्ण सत्य नहीं थी। इसीलिए यह अनुचित भी थी।

मैं अपनी यह पोस्ट सखेद, क्षमा-याचना सहित हटा रहा हूँ।

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यह अभिलेखीकरण: अपने नायकों के साथ इतिहास में दर्ज होने का अवसर

नौ अगस्त को संसद में, ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के 75 वर्ष पूरे होने के प्रसंग पर बोलते हुए तमाम पार्टियों के नेताओं ने, स्वतन्त्रता संग्राम में अपने-अपने नेताओं के योगदान का उल्लेख किया। दूसरी पार्टियों के नेताओं को या तो भूल गए या जानबूझकर उनकी अनदेखी कर दी। भाजपा के पास अपना कोई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी नहीं है। सो प्रधान मन्त्री ने उन नेताओं के नाम छोड़ दिए जिनसे उनका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ नफरत करता है। लगभग तमाम राजनीतिक दलों और तटस्थ प्रेक्षकों ने मोदी के इस व्यवहार को अशालीन निरूपित किया।


यह सब सुनते हुए, भाई साडॉक्टर बंसीधरजी बार-बार याद आने लगे। उनका गाँव भाटखेड़ी का पड़ौसी कस्बा मनासा मेरी जन्मस्थली है। वे बड़ौदा में बस गए हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा मनासा, इन्दौर में हुई। स्वर्गीय डॉक्टर शिव मंगल सिंहजी सुमन के निर्देशन में ‘मालवी की उत्पत्ति और विकास’ विषय पर 1968 में पी. एचडी. करने के बाद 1969 में बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ विश्व विद्यालय में सहायक व्याख्याता के रूप में पदस्थ हुए और पदोन्नत होते-होते 1996 में रीडर बने। नौकरी के दौरान गुजराती के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों की अनेक कृतियों के गुजराती अनुवाद किए। सयाजी राव गायकवाड़ (तृतीय) के जीवन ने उनका ध्यानाकर्षण किया। फलस्वरूप 1992 में ‘भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन में सयाजीराव का योगदान’ शीर्षक से उनकी पुस्तक सामने आई। इसका मराठी अनुवाद छपने की तैयारी में है। सन् 2000 में, सयाजी राव के 20 अंग्रेजी भाषणों का अनुवाद ‘दीर्घ दृष्टा सयाजीराव’ छपा। 2004 में ‘लोक स्मृति में सयाजीराव’ शीर्षक से संस्मरण संकलन पहले हिन्दी में और बाद में गुजराती में आया। सयाजी राव के 250 भाषणों का अनुवाद तीन खण्डों में प्रकाशित करने की योजना के तहत पहला खण्ड प्रकाशन की देहलीज पर है। सयाजी राव के प्रति इस रुझान के चलते 2007 में विश्व विद्यायलय में सयाजी फाउण्डेशन के समन्वयक बनाए गए। 

अपने ईलाज के लिए मैं मई 2016 में बड़ौदा में भर्ती रहा। बंसीधरजी लगातार पूछ-परख के लिए अस्पताल आते रहे। मेरे बहाने वे अपनेे अतीत में टहलते रहे और मैं उनके साथ चलता रहा - मौन। एक दिन उन्होंने ‘ओजस्वी आजाद’ शीर्षक पुस्तक दी। मूल लेखक बीरेन कोठारी हैं। बंसीधरजी ने उसका हिन्दी अनुवाद किया है। संसद में हमारे नेताओं द्वारा की जा रही, एक दूसरे की शिकायत ने मुझे इस पुस्तक की याद दिला दी।

बड़ौदा के मनहर भाई शाह ने बीरेन कोठारी की कलम से अपने स्वर्गीय काका, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी रसिक भाई आजाद के व्यक्तित्व और स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका का अभिलेखीकरण (डाक्यूमेण्टेशन) करवाया है। ऐसा करने का कोई विचार मनहर भाई के मन में नहीं था। किन्तु हुआ यह कि उनके एक मित्र ने उन्हें एक किताब भेजी। ‘पडकार सामे पुरुषार्थ’ (चुनौती को पार कर पाने का पुरुषार्थ) शीर्षक यह पुस्तक, अहमदाबाद के आदर्श प्रकाशन से जुड़े नवनीत भाई मद्रासी नामक सज्जन पर केन्द्रित थी। वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। बीरेन कोठारी इसके लेखक थे। मनहर भाई न तो लेखक को जानते थे न ही पुस्तक के नायक को। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही मनहर भाई को अपने काका रसिक भाई याद आ गए। उन्होंने कई बार उनसे कहा था - ‘काका! आपके जीवन सम्बन्धी कुछ बातें बोलिए। मैं बैठकर उन्हें कागज पर उतारता जाऊँगा।’ लेकिन रसिक भाई को अपने बारे में बताना अच्छा नहीं लगता था। सो, वे हर बार कोई न कई बात बनाकर टाल देते थे। उनकी मृत्योपरान्त मिले उनके और उनके मित्रों के पुराने पत्रों से उनके काम और उनके व्यापक जीवन की हलकी सी झलक अनुभव हो पाई। मनहर भाई को लगा कि काका के संस्कारों की पूँजी से प्रगति करनेवाली पीढ़ी तो उन्हें जानती है। लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी यह जानकारी धुंधली होती जाएगी। तब, अगली कितनी पीढ़ियाँ उन्हें और उनके कामों को याद रख पाएँगी? इस विचार ने ही मनहर भाई के मन में ‘ओजस्वी आजाद’ का अंकुरण किया। उन्होंने बीरेन कोठारी से सम्पर्क किया। यह संयोग ही रहा कि कोठारीजी की ननिहाल उसी सांढासाल गाँव में थी जो रसिक भाई की मुख्य कार्यस्थली था। मनहर भाई ने अपने पास की सारी सामग्री और सूचनाएँ उन्हें सौंपी। कोठारीजी ने सामग्री का अध्ययन किया, रसिक भाई से जुड़े अधिकाधिक लोगों से भेंट की, उनकी कार्यस्थलियों की यात्रा की। पुस्तक का गुजराती (मूल) संस्करण फरवरी 2014 में प्रकाशित हुआ। हिन्दी के पाठकों को भी रसिक भाई के जीवन से प्रेरणा मिले, इस भावना से उन्होंने बंसीधरजी से इसका हिन्दी अनुवाद कराया।

इस पुस्तक ने मनहर भाई ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी। कारगिल युद्ध के दौरान 1999 में बड़ौदा के दस गैर सरकारी संगठनों ने मिलकर ‘जन जागृति अभियान’ संगठन गठित कर, ‘याद करो कुर्बानी’ शीर्षक से, अंचल के 68 स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों से जुड़ी सन्दर्भ सामग्री संकलित कर पूरे गुजरात में प्रचारित-प्रसारित करने की योजना बनाई। मीरा बहन भट्ट रचित यह पुस्तक 2013 तक चार जिलों की शालाओं, महाशालाओं, पुस्तकालयों में निःशुल्क पहुँचाई जा चुकी थी। यह क्रम निरन्तर है। बंसीधरजी ने बताया कि ऐसे उपक्रम गुजरात के अन्य अंचलों में कभी व्यक्तिगत स्तर पर तो कभी सांगठनिक स्तर पर होते रहते हैं।

संसद में हमारे राजनेताओं की बातें और शिकायतें सुन कर मुझे ऐसी किताबों की आवश्यकता और प्रासंगिकता तेजी से अनुभव होने लगी। लड़ती तो बेशक पूरी फौज है लेकिन नाम तो सेनापति का ही होता है। इसके अतिरिक्त उन्हीं सैनिकों का उल्लेख हो पाता है जो महत्वपूर्ण घटनाओं या कि परिणामों को प्रभावित करते हैं। लड़नेवाले तमाम सैनिकों की बात तो कोसों दूर रही, मरनेवाले तमाम सैनिकों के नाम भी उल्लेखित कर पाना दुनिया के किसी भी इतिहासकार के लिए सम्भव न तो हो पाया है न ही कभी हो पाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर कुछ नाम सामने आएँगे। प्रान्तीय स्तर पर तनिक अधिक नाम साने आ जाएँगे। लेकिन जिला, तहसील, नगर, कस्बा, गाँव स्तर पर अनेक सामने आ जाएँगे। ये सारे नाम प्रायः ही गुमनाम ही रहते हैं। यदा-कदा स्थानीय समारोहों या गोष्ठियों में सामने आ जाएँगे। तमाम लोगों या सूचीबद्ध करने की जिम्मेदारी निभाने में कोई भी सरकार कभी भी सफल नहीं हो सकती। ऐसे में अपने शहीदों, इतिहास पुरुषों की सार-सम्हाल की जिम्मेदारी हमें, स्थानीय स्तर पर ही लेनी पड़ेगी जिस तरह कि ‘जन जागृति अभियान’ और मनहर भाई ने किया। 

अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों के अलावा बाकी तमाम सामाजिक, सार्वजनिक कामों के लिए हम सरकारों पर आश्रित होते जा रहे हैं। ऐसे में स्थिति ‘महापुरुष हमारे, देखभाल तुम करो’ तक आ पहुँची है। अपने इस व्यवहार पर हमें गम्भीरता से, विस्तृतरूप से पुनर्विचार करना चाहिए। विभिन्न धार्मिक यात्राओं, भण्डारों, आयोजनों पर हम आए दिनों लाखों रुपये खर्च करते रहते हैं। जाहिर है, ऐसे कामों पर खर्च करने के लिए हमारी जेब और दिल बहुत बड़े हैं। अपने अंचल के महापुरुषों, शहीदों, कलाकारों, साहित्यकारों की याद के अभिलेखीकरण (डाक्यूमेण्टेशन) पर बहुत ही कम खर्च आएगा। हम सरकारों को कोसने  के बजाय इन कामों में अपनी भूमिका तय नहीं कर सकते? धार्मिक उपक्रम अखबारों की एक दिन की सुर्खी और लोगों के मन में कुछ दिनों की याद बन कर रह जाएँगे लेकिन यह अभिलेखीकरण हमारे नायकों को ही नहीं हमें भी इतिहास में दर्ज कर देगा। 

फूलों के साथ धागा भी देवताओं के कण्ठ तक पहुँच जाता है। हमारे अपने अंचल के अनगिनत फूल हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं। इन्हें  सहेज कर, इनके साथ हम खुद भी समय-देवता के कण्ठ तक नहीं पहुँचना चाहेंगे?
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 17 अगस्त 2017 को प्रकाशित)


मुख्यमन्त्री की चेतावनी: अफसरों का चुटकुला

मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम के प्रमुख अभियन्ता  अनिलचन्द सूर्या गए दिनों लेबड़-जावरा फोर लेन सड़क से गुजरे तो गड्ढों से परेशान हो गए। उन्होंने सड़क से ही, सड़क की देख-रेख की जिम्मेदार और टोल वसूल रही, एस्सेल कम्पनी के कर्ता-धर्ता कृष्णा माहेश्वरी को फटकार लगा कर फौरन ही मरम्मत कराने का आदेश देकर पूछा कि क्यों नहीं उनके टोल नाके बन्द कर दिए जाएँ? फटकार और पेट पर पड़ती लात के भय का असर हुआ और अगले ही दिन सड़क मरम्मत का काम शुरु हो गया। गड्ढों से उपजी परेशानी के समाचार अखबारों में लगातार छप रहे थे और लोग नेताओं से भी गुहार लगा रहे थे किन्तु  कोई असर नहीं हो रहा था। इस सड़क से मन्त्री भी आए दिनों यात्रा करते रहते हैं उन्होंने अखबार नहीं पढ़े होंगे लेकिन स्थानीय नेताओं ने तो कहा ही होगा। उन्होंने सुनने की खानापूर्ति कर ली होगी। या फिर हो सकता है, उन्हें अच्छी तरह पता रहा होगा कि उनके कहे का कोई असर नहीं होगा। कह कर बेइज्जती कराने से अच्छा है, कहा ही न जाए। लेकिन अफसर ने यह सब कुछ नहीं सोचा और ‘घण्टों का काम मिनिटों में’ हो गया।

साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में खबर पढ़ी कि प्रतिभावान छात्रों की फीस जमा करने के आदेश मुख्य मन्त्री ने महीनों पहले दे दिए। लेकिन फीस अब तक जमा नहीं हुई। अफसर ध्यान ही नहीं दे रहे। सम्वाददाता को मैं जानता था। उससे बात की। उसने एक कदम आगे बढ़कर ताज्जुबवाली बात बताई कि एक समारोह में खुद मुख्य मन्त्री ने यह जानकारी दी और कहा कि वे तो अपना काम कर चुके लेकिन अफसर कार्रवाई नहीं कर रहे। सम्वाददाता ने लगे हाथों एक और बात बताई कि कुछ ही दिन पहले मुख्य मन्त्री एक समारोह में धमकी दे चुके थे कि यदि उनके आदेश का क्रियान्वयन नहीं हुआ तो वे कलेक्टर को उल्टा लटका देंगे। मुझे विश्वास नहीं हुआ कि कोई मुख्य मन्त्री सार्वजनिक रूप से ऐसा कह सकता है। एक कलेक्टर मेरे मित्र हैं। उनसे पूछा। उन्होने हँसते हुए पुष्टि की। मैंने पूछा कि उनकी (आईएएस अफसरों की) जमात ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई? हँसते हुए ही वे बोले - ‘क्या आपत्ति जताना? हम सब (अफसर) और प्रदेश की जनता जानती है कि मुख्य मन्त्रीजी जो कहते हैं वह करते नहीं। तालियाँ पिटवाने के लिए ऐसा कहना जरूरी था। कह दिया। तालियाँ पिटवा लीं। अफसरों को जो करना है, अपने हिसाब से करेंगे।’ सुनकर मुझे ताज्जुब तो हुआ, दुःख भी हुआ और बुरा भी लगा। हम जनप्रतिनिधित्व आधारित संसदीय लोकतन्त्र में रह रहे हैं और किसी कलेक्टर को अपने मुख्य मन्त्री के कहे (काम करने) की और चेतावनी की तनिक भी परवाह नहीं! यह तो लोकतन्त्र नहीं अफसर तन्त्र हुआ! लेकिन क्या दुखी होऊँ और क्या बुरा मानूँ। सूर्याजी का उदाहरण मेरे सामने था।

खुद ने देखा तो नहीं किन्तु बार-बार सुना कि मुख्यमन्त्री (स्वर्गीय) गोविन्द नारायण सिंहजी जब वल्लभ भवन के बरामदों से गुजरते थे तो अफसर लोग, सामने जो दरवाजा नजर आता (भले ही वह सुविधा घर का दरवाजा हो) उसमें घुस जाते। उनके सामने आने से घबराते थे। गोविन्द नारायण सिंहजी आईसीएस और आईपीएस, दोनों पात्रताधारी थे। कोई अफसर उन्हें ‘चलाने’ की कोशिश करता तो फौरन पकड़ लेते और भरी भीड़ में उसकी लू उतार देते। उन्हें मूर्ख बनाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था। 

यह किस्सा खुद दादा ने सुनाया था। वे 1967 में पहली बार विधायक बने थे। पं. द्वारका प्रसादजी मिश्र ने उन्हें उम्मीदवार बनवाया था। अपने मन्त्री मण्डल मे उन्होंने दादा को सामान्य प्रशासन विभाग का संसदीय सचिव बनाया था। दादा को नियमित रूप से मिश्रजी के दफ्तर में उपस्थिति देनी होती थी। एक बार उन्होंने दादा से कहा - ‘बस्तर कलेक्टर से बात कराओ।’ दादा ने ट्रंक बुकिंग  नम्बर मिला कर कहा - ‘प्लीज बुक एन इमीजीएट कॉल फॉर बस्तर.......’ दादा इससे आगे कुछ बोलते, उससे पहले ही मिश्रजी ने डाँटते हुए कहा - ‘फोन रख दो।’  और उसी तरह डाँटते हुए बोले - ‘चीफ मिनिस्टर खुद कलेक्टर से बात करेगा? आगे से ध्यान रखना। चीफ मिनिस्टर को यदि कलेक्टर से बात करनी है तो कमिश्नर से कहो कि अपनी कमिश्नरी के फलाँ कलेक्टर से कहे कि वह सी एम से बात करे।’ लेकिन यह 1967 की बात है। तब से लेकर अब तक तो नदियों में इतना पानी बह गया कि मुख्यमन्त्री की, कलेक्टर को उल्टा टाँग देने की धमकी चुटकुले की तरह सुनी जाती है।

दा साहब स्वर्गीय माणक भाई अग्रवाल कहा करते थे - ‘सरकार नहीं चलती। सरकार का जलवा चलता है।’ यह ‘जलवा’ सेठीजी (स्व. प्रकाशचन्द्रजी सेठी) के मुख्यमन्त्रित्व काल में भी सतह पर ही नजर आता था। सेठीजी का आदेश अफसरों के लिए चेतावनी की तरह होता था। वे किसी का बुरा नहीं करते थे (सम्भवतः किसी का बुरा किया भी नहीं होगा) किन्तु बुरा हो जाने का भय बराबर बना रहता था। 

1977 से 1991 तक के चौदह वर्षों तक मैं एक दवा उत्पादक लघु उद्योग में भागीदार रहा। उसी दौरान 1987 में मुझे संभागीय उद्योग संघ का सचिव बनाया गया। तब तक मैं राजनीति, प्रशासन और पत्रकारिता के गलियारों में अपने स्तर के मुताबिक घूम चुका था। मुझे समझ आ गई थी कि समस्याओं के निदान के लिए अफसर ही उपयोगी और सहायक होते हैं। मुझे सचिव के प्रभार में दो समस्याएँ मिली थीं। पहली - छाता बनानेवाली चार इकाइयों की सेल्स टैक्स सबसीडी न मिलना और दूसरी - नायलोन रस्सी पर अनुचित कराधान। दोनों के लिए स्थानीय नेताओं और मन्त्रियों से भरपूर निवेदन-ज्ञापन हो चुके थे लेकिन निदान नहीं हो रहा था। हम लोगों ने तत्कालीन सेल्स टैक्स कमिश्नर प्रमोद कुमारजी दास को और तत्कालीन उद्योग सचिव (मुझे उनका नाम याद नहीं आ रहा) को अलग-अलग समाराहों में आमन्त्रित किया। पहली समस्या  हाथों हाथ निपट गई। दासजी के जाने से पहले ही सबसीडी जारी करने के आदेश हो गए। दूसरा मामला नीतिगत था। उद्योग सचिव को हमने नायलोन की रस्सी बनाने की पूरी प्रक्रिया मौके पर बताई। उनकी पीठ सुनती है, उन्होंने बड़प्पन बरतते हुए स्वीकार किया कि निर्माण प्रक्रिया देखने के बाद ही वे समस्या समझ पाए। उन्होंने वादा किया (उनके शब्द थे - आई प्रामिस यू) कि भोपाल जाते ही वे सबसे पहले उद्योगों के पक्ष में आदेश जारी करेंगे और उसकी एक प्रति हमें अलग से भिजवाएँगे। उन्होंने अपना वादा अक्षरशः निभाया।  

एक बतरस बैठक में स्वर्गीय सीतारामजी जाजू को कहते सुना था कि अफसरशाही से काम लेना याने शेर की सवारी करना। आपको, सुरक्षित रहते हुए, शेर को नियन्त्रित, लक्ष्य की ओर गतिवान बनाए रखते हुए मुकाम पर पहुँचना होता है। लेकिन मुकाम पर पहुँचना ही पर्याप्त नहीं। वहाँ पहुँच कर सुरक्षित रूप से उतरना भी उतना ही कौशल माँगता है जितना शेर की सवारी करने में। सवारी करने के पहले क्षण से लेकर उतरने के अन्तिम क्षण तक आपको शेर को यह अनुभूति भी करानी होती है कि आप उसके सवार नहीं, मित्र, शुभचिन्तक, हितरक्षक हैं।

प्रत्येक काल खण्ड के अपने मूल्य होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति की अपनी कार्य शैली। किन्तु लोक कल्याण स्थायी मूल्य है। यही शासक की कसौटी भी होता है। तब के नेता शायद इसी की चिन्ता करते रहे होंगे। आज उन्हें अपने-अपने हाई कमान की चिन्ता पहले करनी पड़ती है। लेकिन हाई कमान का भी एक हाई कमान होता है - नागरिक। उसकी दुआ भी लगती है और बददुआ भी। यह किसी ने नहीं भूलना चाहिए।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’ भोपाल में, 10 अगस्त 2017 को प्रकाशित)