जीएसटी: दरिद्र नागरिकों की अमीर सरकार

‘लोग जीएसटी को खामखाँ बदनाम कर रहे हैं। इसमें कुछ भी उलझनभरा नहीं। बहुत ही आसान। यह फार्मूला अपनाइये - जीतेन्द्र रतलाम में कपड़े का थोक व्यापार करता है। उसका साला वीरेन्द्र इन्दौर में होटल चलाता है। वीरेन्द्र का साला नरेन्द्र भोपाल में ट्रांसपोर्ट का धन्धा करता है। नरेन्द्र के चाचा का लड़का संजय रायसेन में बीमा एजेण्ट है। संजय का चचेरा भाई अजय झाँसी में प्रापर्टी ब्रोकर है। अजय का फूफा विजय लुधियाना में गारमेण्ट फैक्ट्री चलाता है। विजय का दामाद चंचल रोहतक में आरटीओ में बड़ा बाबू है। चंचल की सास आरती बेन सूरत में वार्ड पार्षद है। आरती बेन की बड़ी बेटी किंजल दादर (मुम्बई) में वकालात करती है। आपको करना क्या है? बस यही तलाश करना है कि जीतेन्द्र और किंजल का क्या रिश्ता हुआ? यह समझ गए तो जीएसटी समझ गए। बस! इतनी सिम्पल सी बात भी न समझ सके तो फिर धन्धा क्या खाक करेंगे? यह नासमझी आपकी प्राब्लम है। जीएसटी का कोई दोष नहीं।’ मैं हक्का-बक्का, उनका मुँह देखने लगा। मेरी दशा, ‘आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास’ जैसी हो गई। मैं गया था जीएसटी समझने और मुझे यह पहेली थमा दी गई।

मेरी दशा देख वे हँस पड़े। वे मेरे कस्बे के जाने-माने सी ए हैं। मुझे जीएसटी समझना था। सोचा, व्यापारियों और राजनेताओं से मिलने का कोई मतलब नहीं। उनके अपने-अपने आग्रह/पूर्वाग्रह हैं। इसलिए कुछ सी ए से मिलना तय किया। यह भी कि केवल भाजपाई सीए से मिलूँगा। पाँच सी ए से मिल चुका था। ये छठवें थे। इनकी और मेरी खूब पटती है। ये भी सीधे मुँह बात नहीं करते और मैं भी। बहुत ही परिहासप्रिय। बोले - ‘आपको क्या समझाऊँ? अभी तो हम सी ए ही इसका आदि और अन्त तलाश कर रहे हैं। इसकी सैद्धान्तिकता और व्याहारिकता का समन्वय बिन्दु खोज रहे हैं। आप पेरासिटामॉल की गोली की तरह समझना चाहे रहे हैं। गोली ली और बुखार दूर। लेकिन यह ऐसा नहीं है। चीज तो अच्छी है लेकिन अमल में आने पर ही सारी चीजें धीरे-धीरे साफ होंगी।’

पूरी बात मुझे किसी एक जगह नहीं मिली। लेकिन छहों जानकारों से मिली बातें कुल मिलाकर भयावह निराशाजनक चित्र ही बनीं।

सबका कहना था कि यह प्रणाली है तो बहुत अच्छी लेकिन इसका निकृष्ट क्रियान्वयन ‘सब-कुछ ध्वस्त होने की सीमा तक गुड़-गोबर कर देगा।’ इसकी परिणति साफ नजर आ रही है - ‘न खुदा ही मिला न विसाले सनम।’ सड़कछाप जबान में ‘खाया-पीया कुछ नहीं। गिलास फोड़ा छः आने।’ 

जीएसटी वस्तुतः कर चोरी को समूल नष्ट करदेनेवाली प्रणाली है। लेकिन कर चोरी हमारी आदत है और पडी आदत तो श्मशान में ही छूटती है। फिर, हम एक आदर्श अनुप्रेरित समाज हैं - ‘जैसा राजा, वैसी प्रजा।’ हम सब अपने राजा की जय भले ही बोलते हैं लेकिन जानते हैं कि हमारे शासक ईमानदार नहीं हैं। ऐसे में जीएसटी लागू करने का मतलब ‘बेईमान नेताओं द्वारा ईमानदार मतदाता की चाहत’ है जो चूँकि वाजिब नहीं है इसलिए सम्भव भी नहीं। इसलिए यह प्रणाली कर संग्रह के मामले में भले ही सरकार की मंशा पूरी कर दे लेकिन कर चोरी रुकने की रंचमात्र भी उम्मीद नहीं।  तब देश में ‘दरिद्र लोगों की अमीर सरकार’ होगी।

इन सी ए के अनुसार यह भाजपा का चारित्रिक बदलाव (रेडिकल चेंज) भी है। अब तक भाजपा को व्यापारियों की पार्टी कहा जाता है। लेकिन जीएसटी लागू कर भाजपा ‘कार्पोरेट घरानों की पार्टी’ में बदल गई है। अब छोटे व्यपारियों के लिए धन्धा कर पाना असम्भवप्रायः हो जाएगा। छोटी दुकानों पर सामान मँहगा मिलेगा और बड़े शो-रुमों/मॉलों में सस्ता। जीएसटी के मुताबिक अब वही व्यापारी काम कर सकेगा जिसके पास आईटी तकनीक के नवीनतम भरपूर साधन और जानकार लोग होंगे। यह सब कार्पोरेट घरानों के पास पहले से ही मौजूद है। जबकि छोटे व्यापारी को यह सब स्थापित करने के लिए ढेर सारी पूँजी लगानी पड़ेगी। पहले दुकानदार एमआरपी से कम पर माल बेच देता था। अब वह सम्भव नहीं होगा। अब उसे मुनाफे में भरपूर कमी करके माल बेचना पड़ेगा। परिणाम होगा कि ग्राहक को माल मँहगा मिलेगा और दुकानदार जिन्दा रहने के लिए संघर्ष करेगा। एक सी ए ने साफ-साफ कहा - ‘अब छोटे दुकानदार बड़े मॉलों में सेल्समेन या मुनीम की नौकरी करते नजर आएँ तो ताज्जुब मत कीजिएगा।’ 

एक सी ए ने बहुत ही आधारभूत बात कही - ‘अस्पष्ट और जटिल कर प्रणाली सदैव व्यापारी और ग्राहक के लिए दुःखदायी होती है। जीएसटी ऐसी ही है। इसकी व्याख्या करने का अधिकार और सुविधा अफसरों को दे दी गई है। अब उनका कहा अन्तिम होगा। इसके चलते मशीनरी खुल कर खेलेगी। अब हालत यह हो जाएगी कि ईमानदार कारिन्दे को भी रिश्वत लेनी ही पड़ेगी। इंस्पेक्टर राज खुलकर खेलेगा और अफसरशाही ताण्डव करेगी। 

एक सी ए ने मानो भविष्यवाणी की - ‘प्रदेश का सेल्स टैक्स (वाणिज्यिक कर) का अमला अब तक भोला था। व्यापारी जो कहता, देता था, प्रसन्नतापूर्वक ले लेता था। क्योंकि पहले सेल्स टैक्स और एक्साइज अलग-अलग लगता था और अधिकांश व्यापारी एक्साइज से मुक्त थे। एक्साइज के अमले के भाव, सेल्स टैक्स वालों के मुकाबले कई गुना होते हैं। अब जीएसटी में सेल्स टैक्स और एक्साइज एक हो गए हैं। इसके चलते सेल्स टैक्स का ‘भोला-भाला’ अमला खूँखार हो जाएगा। ऐसे में अब एक्साइज मुक्त व्यापारी भी एक्साइज का ‘जबराना’ चुकाने को मजबूर होगा।’

जीएसटी को अपने पेशे से जोड़ते हुए एक सी ए ने कहा - ‘अब हम लोग कम व्यापारियों में पहले से ज्यादा व्यस्त हो जाएँगे। पहले व्यापारी को साल भर में पाँच रिटर्न फाइल करने पड़ते थे। अब सैंतीस करने पड़ेंगे। व्यापारी के पास पहले पाँच के लिए ही वक्त नहीं होता था। वह सैंतीस के लिए वक्त कहाँ से लाएगा? जाहिर है कि हमारा काम नौ गुना बढ़नेवाला है।’

एक सी ए ने इसमें रोजगार की सम्भावनाएँ देखीं। कहा कि ऐसे अनेक युवा हैं जो सी ए बनना तो चाहते थे लेकिन बन नहीं पाए। ऐसे तमाम आधे-अधूरे सी ए को ‘पात्र’ (क्वालिफाइड) सी ए की हैसियत मिल जाएगी। इनके अलावा अनेक ‘नीम हकीम सलाहकार’ भी सामने आ जाएँगे। भय यह है कि कर प्रणाली की अस्पष्टता/जटिलता और अधकचरे सलाहकारों की भीड़ के चलते ऊँची दरों वाले बिचौलियों की नई किस्म न विकसित हो जाए।

एक सी ए ने मर्मान्तक पीड़ा से कहा - ‘मैं कट्टर भाजपाई हूँ और मोदी का समर्थक भी। लेकिन एक सी ए के रूप में सचाई से मुँह नहीं मोड़ सकता। मैं साफ देख रहा हूँ कि अपने इंटेंशन्स के मामले में यह (जीएसटी) बुरी तरह से विफल होगी। औंधे मुँह गिरेगी। अफसरों, इंस्पेक्टरों, बाबुओं की रिश्वतखोरी और नेताओं के भ्रष्टाचार में तिल भर भी कमी नही आएगी। सब कुछ वैसा का वैसा ही चलता रहेगा। सरकार को रेवेन्यू तो मिलेगा लेकिन लोगों की बददुआएँ भी मिलेंगी। तकलीफ की बात यह है कि मैं यह सब होते हुए देखूँगा, इसका पार्ट एण्ड पार्सल बनूँगा। लेकिन कर कुछ नहीं पाऊँगा।’

जिन छठवें सी ए सा’ब से बात शुरु की थी, उन्हीं से खतम कर रहा हूँ। मेरे मजे लेने के बाद संजीदगी से बोले - ‘यह सब देखते, कहते बहुत तकलीफ हो रही है। नोटबन्दी नाश थी। जीएसटी सर्वनाश नहीं तो सत्यानाश तो है ही। कोढ़ में खाज वाली कहावत भी इसके सामने कहीं नहीं लगती। भगवान सब ठीक करे।’

जीएसटी से मेरा दूर-दूर का वास्ता नहीं। लेकिन मैं डरा हुआ हूँ। बहुत ज्यादा। पता नहीं, जिनका इससे वास्ता है, उनका क्या हाल होगा।
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(दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल में 20 जुलाई 2017 को प्रकाशित)

धर्म की समानता और जाति-वर्ण का भेद साथ-साथ नहीं निभता

यह इसी जुलाई के पहले सप्ताह की बात है। भोपाल से कोई चालीस किलो मीटर दूर स्थित जिला मुख्यालय सीहोर की। दलित युगल पंकज जाटव और वैजयन्ती ने, गंज इलाके में स्थापित डॉक्टर अम्बेडकर की मूर्ति के फेरे लेकर विवाह किया। दोनों के परिवारों के पास इतने पैसे नहीं थे कि विवाह आयोजन कर सके। जाटव समाज यूँ तो हिन्दू समाज है लेकिन इन दोनों ने पवित्र अग्नि और हिन्दू देवताओं की अदृष्य साक्ष्य में फेरे नहीं लिए। अम्बेडकर को गवाह बनाया।

बसन्त पंचमी पर सरस्वती पूजन के आयोजन व्यापक स्तर पर किए जाते हैं। यह दिन इसी प्रसंग के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बरस की बसन्त पंचमी पर उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड के अनेक गाँवों में सरस्वती पूजन नहीं हुआ। लोगों ने देवी सरस्वती के चित्र के स्थान पर सावित्री बाई फुले के चित्रों की पूजा कर बसन्त पंचती मनाई। उन्होंने कहा कि वही उनकी सरस्वती है। खबर है कि 2018 में ऐसे आयोजन अधिकाधिक स्थानों पर, अधिकाधिक भव्यता से किए जाने की तैयारी है।

घड़कौली, सम्भवतः बिहार का एक छोटा सा गाँव है। चमारों की बस्ती है। वहाँ के लोगों ने अपने गाँव का नाम बदल कर ‘डॉ. भीमराव अम्बेडकर ग्राम’ रख लिया है। वे यहीं नहीं रुके। गाँव के नामवाले बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘दा ग्रेट चमार’ लिख कर अपनी सामाजिक प्रताड़ना, उपेक्षा को अपना गर्व घोषित किया है।

2014 में दिल्ली में बड़ा हंगामा हुआ था।  मासिक पत्रिका ‘फारवर्ड प्रेस’ के सम्पादक, दलित लेखक-विचारक प्रमोद रंजन को कुछ महीने भूमिगत रहना पड़ा था। वे तभी बाहर आए थे जब उनकी अग्रिम जमानत हो गई। पत्रिका के इस अंक में, हिन्दू देवी दुर्गा और महिष का एक चित्र छपा था जिसमें, महिष वध के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं द्वारा आदिवासी नायकों, देवी-देवताओं पर किए गए अत्याचारों का उल्लेख किया गया था। कट्टर हिन्दू समाज ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया की थी और अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग कर प्रमोद रंजन तथा उनके सहयोगियों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई की थी। हिन्दू समाज की इस कार्रवाई की प्रतिक्रिया में बिहार, झारखण्ड के अन्तरवर्ती इलाकों में अनेक स्थानों पर महिष महात्सवों की खबरें आई थीं।

गए दिनों एक आई ए एस अधिकारी का भाषण फेस बुक और वाट्स एप पर ‘वायरल’ हुआ। दलित समुदाय से जुड़े ये अधिकारी स्थिर चित्त और शान्त भाव से श्रोताओं का आह्वान कर रहे थे - ‘गीता को समुद्र में फेंक दो।’ (क्योंकि यह मनुष्य-मनुष्य में भेद करती है।) लेकिन यह आह्वान महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है, हिन्दू समाज में हुई इसकी प्रतिक्रिया। कोई सामान्य आदमी यह आह्वान करता तो देशव्यापी हंगामा हो जाता। किन्तु इस मामले में ‘आहत भावनाएँ’ आक्रामक स्वरों में गर्जन-तर्जन करने के बजाय मिमिया कर रह गईं। निश्चय ही यह ‘आई ए एस’ के प्रभाव से ही हुआ होगा।

बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखण्ड के अनेक समुदायों के वैवाहिक निमन्त्रण-पत्रों का स्वरूप बदल गया है। इन पर अब किसी हिन्दू देवी-देवता का न तो नाम छप रहा है न ही चित्र। इनके स्थान पर अम्बेडकर, ज्योति बा फुले, काशीराम, विवेकानन्द, गौतम बुद्ध, मायावती, स्थानीय दलित नेताओं के चित्र और इन्हीं के उद्धरण छप रहे हैं। ऐसे निमन्त्रण-पत्र छपवानेवालों में उच्च शिक्षित और अशिक्षित समान रूप से शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश में ‘धम्म सम्मेलनों’ की मानो बाढ़ आ गई है। बाढ़ नहीं तो फैशन तो आ ही गया है। छोटे-छोटे गाँवों से लेकर बड़े कस्बों, नगरों में धम्म सम्मेलनों के आयोजन एक के बाद एक होने की खबरें निरन्तर आ रही हैं। 

‘सेनाओं’ के मामले अब तक बिहार और राजस्थान से ही मुख्यतः जुड़े रहे हैं। लेकिन ‘भीम सेना’ या कि ‘भीम आर्मी’ अचानक ही एक धूमकेतु की तरह उभरी और छा गई। इसकी मौजूदगी अब गाँव-गाँव में नजर आने लगी है। चन्द्रशेखर ‘रावण’ के रूप में दलित युवकों को आवेशित, ऊर्जित करनेवालाएक नया नायक मिल गया। 

अभी-अभी, दो ही दिन पहले किन्हीं प्रो. जयराम (यही नाम या आ रहा है मुझे) का, तेरह मिनिट का एक भाषण देखने/सुनने को मिला। इसका विषय था - ‘एससी, एसटी, ओबीसी का हिन्दू धर्म से कोई नाता नहीं है।’ ऐसे व्याख्यान महानगरों के बड़े-बड़े आडिटोेरियमों में हो रहे हैं जिनमें खड़े रहने की जगह नहीं मिलती। आदिवासियों को याद दिलाया जा रहा है कि भारत के ‘मूल वासी’ वे ही हैं, हिन्दू नहीं। हिन्दू तो हमलावर बन कर यहाँ आये। 

ये सारी बातें, ये सारी घटनाएँ न तो अचानक हुई हैं न ही एक साथ हुई हैं। लेकिन इनका ‘कोलॉज’ अपने आप में एक सन्देश देता है। नहीं जानता कि आप इसका क्या अर्थ लेते हैं किन्तु मेरे तईं इसका सन्देश है - यदि सब कुछ ऐसा ही चलता रहा जैसा कि इस क्षण चलता नजर आ रहा है तो जल्दी ही इस देश में हिन्दू, अल्प संख्यक हो जाएँगे। और यह किसी ‘अल्पसंख्यकों के षड़यन्त्र’ के कारण नहीं, खुद हिन्दू समाज के कारण होगा। 

भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के मकसद से, गए तीन बरसों से देश में जो हो रहा है, यह उसी की प्रतिक्रिया है। हिन्दू राष्ट्र निर्मातओं को यह अन्तिम अवसर अनुभव हो रहा है और वे अपने जीते-जी अपना सपना-संकल्प पूरा करने के लिए पण-प्राण से जुटे हुए हैं। हिटलर का ‘रक्त शुद्धता और नस्लीय श्रेष्ठता’ उनका आदर्श और आधार है। लेकिन वे, परिणाम को आमूलचूल बदलदेनेवाली एक छोटी सी अनदेखी कर रहे हैं। जर्मनी में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था नहीं है। वहाँ जर्मन और यहूदी ही एकमात्र अन्तर था। भारत में वर्ण और जाति व्यवस्था के चलते इसका हिन्दू राष्ट्र बन पाना, उपरोल्लेखित तमाम घटनाओं के लिहाज से असम्भव ही है। धर्म सबको समान मानता है लेकिन जाति और वर्ण पूरी तरह से भेदभाव आधारित हैं। ऐसे में यदि हिन्दू राष्ट्र बनाना है तो सबको केवल हिन्दू मानकर ही व्यवहार करना पड़ेगा। धर्म की समानता और जाति-वर्ण का भेद साथ-साथ नहीं निभाया जा सकता। ऊना में जिन दलितों को नंगा करके पीटा गया वे हिन्दू थे। रोहित वेमुला भी हिन्दू था। वर्ण और जाति के नाम पर देहातों में आज भी हिन्दुओं पर भरपूर अत्याचार हो रहे हैं। वे जूते-चप्पल पहन कर नहीं निकल सकते। वे अपने बच्चों के विवाह की बनोरियाँ, बारातें गाजे-बाजे से नहीं निकाल सकते। दलित दूल्हों को पुलिस संरक्षण में, हेलमेट पहन कर निकलना पड़ रहा है। दलित हिन्दू महिलाएँ निर्वस्त्र कर, गाँवों में घुमाई जा रही हैं। दलित हिन्दू युवाओं, पुरुषों को मल-मूत्र खिलाया-पिलाया जा रहा है। धर्म, वर्ण और जाति के नाम पर नृशंसता और क्रूरता के चरम दृष्य आज भी देखने को मिल रहे हैं। अंग्रेजी कहावत ‘सम्पूर्ण सत्ता सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है’ बदल कर ‘सम्पूर्ण सत्ता चरम अमानवीयता, नृशंसता और क्रूरता सहित सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है’ में बदल गई है।

दलित, शोषित, पीड़ित समाज को विश्वास हो चला है कि वह केवल वोट लेने तक के लिए हिन्दू है, समानता और अवसरों के लिए नहीं। इस बार हुई और हो रही प्रतिक्रिया ने न्यूटन का, गति का तीसरा नियम बदल सा दिया है। इस बार प्रतिक्रिया विपरीत तो हो रही है किन्तु समान नहीं, समान से कहीं अधिक तेज। दीवार पर फेंकी जा रही रबर की गेंद इस बार दुगुनी ताकत से लौटती नजर आ रही है। यह देखना रोचक होगा कि अगली जनगणना में देश के कितने समुदाय खुद को हिन्दू लिखवाने से इंकार करते हैं।

धर्म सदैव ही नितान्त निजी मामला रहा है। वह जब भी सामूहिक होता है तब ध्वस्त करता भी है और  ध्वस्त होता भी है।
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(दैनिक 'सुबह सवेरे', भोपाल में 13 जुलाई 2017 को प्रकाशित)

एक स्वानुभूत, स्वप्रशिक्षित, स्वनिर्मित योग पेथी चिकित्सक

 रोग मुक्ति और कष्ट मुक्ति से जुड़ा अपना यह अनुभव मैं अपनी सम्पूर्ण सद्भावना और सदाशयता से साझा कर रहा हूँ। मेरी इस पोस्ट से प्रेरित हो यदि कोई इस पर अमल करे तो यह बिलकुल जरूरी नहीं कि उसका अनुभव भी ऐसा ही हो। 

मेरे बाँये हाथ की अनामिका (रिंग फिंगर) और कनिष्ठिका (लिटिल फिंगर) लगभग दो वर्ष से अधिक समय से सुन्न हो गई थी। लगता था, हाथ में तीन अंगुलियाँ ही रह गई हैं। लेकिन दो कारणों से इस ओर ध्यान नहीं दिया। पहला कारण, उस समय इससे बड़े कष्ट मुझे घेरे हुए थे। पहले यूरीनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन से ग्रस्त रहा। तभी मालूम हुआ कि मेरी मूत्र नली बहुत ज्यादा सिकुड़ गई है। उसका ऑपरेशन कराना पड़ेगा। वह ऑपरेश करने से पहले सरकम सीजन (खतना) कराना पड़ेगा। दूसरा कारण, इन अंगुलियों के सुन्न होने से कोई काम नहीं रुक रहा था। तो पहले मार्च 2016 में सरकम सीजन और बाद में, मई 2016 में यूरोथ्रोप्लास्टी (मूत्र नली का पुनर्निमाण) ऑपरेशनों से गुजरना पड़ा। जब बड़े कष्टों ये मुक्ति मिली तो इस छोटे कष्ट की ओर ध्यान गया।

जुलाई 2016 के दूसरे पखवाड़े में अपने रक्षक डॉक्टर सुभेदार सा’ब को दिखाया। इस प्रभाव के उन्होंने दो कारण बताए - मधुमेह (डायबिटीज) या फिर सर्वाइकल स्पेण्डिलाइटिस। चूँकि मैं मधुमेही (डायबिटिक) नहीं हूँ सो उन्होंने एक हड्डी रोग विशेषज्ञ से मिलने की सलाह दी। हड्डी रोग विशेषज्ञ ने जाँच के बाद पहला निष्कर्ष सुनाया कि मैं सर्वाइकल स्पेण्डिलाइटिस से प्रभावित हूँ। उन्होंने कुछ दवाइयाँ लिखीं। समय-समय पर वे मुझे जाँचते रहे। कभी वे ही दवाइयाँ दुहराईं तो कभी दो-एक दवाइयाँ बदलीं। मुझे कोई राहत नहीं मिल रही थी। तीसरे महीने उन्होंने फिर दवाइयाँ बदलीं। लेकिन इन दवाइयों का असर यह हुआ कि मेरी आँखों ने खुली रहने से इंकार कर दिया। दिल की धड़कनों के सिवाय मुझे अपने जीवित रहने का कोई अहसास ही नहीं हो। चौबीसों घण्टे सोया रहूँ। घबरा कर सुभेदार साब को दिखाया। उन्होंने हड्डी रोग विशेषज्ञ द्वारा लिखी गोलियाँ तत्क्षण बन्द कराईं। सामान्य होने में मुझे चार दिन लगे। 

हड्डी रोग विशेषज्ञ को मैंने जब पहली बार दिखाया था उसके पाँच-सात दिनों के बाद ही मुझे एक के बाद एक, तीन-चार मित्रों ने सलाह दी कि मैं शास्त्री नगर में योग-प्राणायाम से चिकित्सा कर रहे ‘चौरसियाजी’ को दिखाऊँ। ‘चौरसियाजी’ मेरे लिए अपरिचित नहीं हैं। दुनियावालों के ‘चौरसियाजी’ मेरे लिए ‘ओम’ है। बरसों हो गए उसे देखे लेकिन मैं उसे बरसों से न केवल जानता हूँ बल्कि एक बार तो उसकी पैरवी करने के कारण उसके (अब स्वर्गीय) पिता रामनिवास भाई चौरसिया से खूब अच्छी तरह, भरपूर डाँट भी खा चुका हूँ। मुझे ओम के पास जाने में किसी प्रकार की कोई असुविधा नहीं थी। किन्तु मेरी आदत है कि दो को एक साथ कभी भी दाँव पर नहीं लगाता। इसलिए तय किया कि हड्डी रोग विशेषज्ञ के ईलाज से लाभ न होने की दशा में ओम से मिल लूँगा।

किन्तु योग-संयोग ऐसा रहा कि ओम से मिलने से पहले ही (अक्टूबर 2016 में) पहलेवाले हड्डी रोग विशेषज्ञ से बड़े हड्डी रोग विशेषज्ञ से मिलना हो गया। उन्होंने एक्स-रे करवाया। उनका निष्कर्ष था कि मैं सर्वाइकल स्पेण्डिलाइटिस का ही मरीज हूँ और मुझे ऑपरेशन कराना पड़ सकता है। किन्तु उससे पहले वे कुछ दवाइयाँ देकर देखना चाहेंगे। उनकी दी हुई दवाइयों से भी मुझे कोई राहत नहीं मिली। एक महीने बाद उन्होंने वे ही दवाइयाँ दुहराईं। जब कोई फर्क नहीं पड़ा तो दिसम्बर 2016 में उन्होंने कहा कि मुझे ऑपरेशन कराना ही पड़ेगा। किन्तु वे मुझे ऑपरेशन से बचाना भी चाहते थे। उन्होंने सलाह दी कि मैं पहले किसी स्नायु विशेषज्ञ (न्यूरो फिजिशियन) से मिल लूँ। जनवरी 2017 के पहले सप्ताह में मैं इन्दौर जाकर स्नायु विशेषज्ञ से मिला। प्राथमिक परीक्षण कर उन्होंने सुखद सूचना दी कि मैं सर्वाइकल स्पेण्डिलाइटिस का मरीज बिलकुल नहीं हूँ। उन्होंने नाड़ियों में बिजली के झटके देकर परीक्षणोपरान्त सूचित किया कि मेरे बाँये हाथ की, कोहनी से इन दोनों अंगुलियों तक जा रही एक नाड़ी निष्क्रिय होने से मेरी अंगुलियाँ सुन्न हो गई हैं। उन्होंने कहा कि मैं चिन्ता बिलकुल न करूँ। यह नाड़ी जिस तरह अपने आप निष्क्रिय हुई है उसी तरह अपने आप ही सक्रिय हो जाएगी। उन्होंने एक महीने की दवाइयाँ लिख दीं।
मैंने एक महीने तक उनकी दवाइयाँ लीं। लेकिन कहीं, कोई फर्क नहीं पड़ा। इस बीच मुझे, ‘चौरसियाजी’ से मिलने के परामर्शों की बाढ़ आ गई। मैं ‘चौरसियाजी’ से मिलने की सोच ही रहा था कि अचानक ही एक समारोह में एक परिजन समान डॉक्टर से मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में मैंने सुन्न अंगुलियों का जिक्र किया और पूरी आपबीती सुनाकर कहा कि मुझे ‘चौरसियाजी’ से मिलने की सलाह लगातार दी जा रही है। वे तत्काल बोले - ‘फौरन चले जाइए। मैं भी परेशानी में आ गया था। उन्हीं ने ठीक किया।’ 
अनगिनत आत्मीय लोगों के पुरजोर आग्रह पर एक ‘पात्रताधारी’ (क्वालिफाईड) डॉक्टर ने ठप्पा लगा दिया था। 

इकतीस जनवरी 2017 की शाम मैं ओम (याने ‘चौरसियाजी’) से मिला। उसने अत्यधिक आदरभाव पूरी बात सुनी। मेरी समस्या को ध्यानपूर्वक सुनते हुए मुझसे दो-तीन सवाल किए। मेरी अंगुलियाँ टटोली और सम्पूर्ण आत्मविश्वास से भरोसा दिलाया कि मैं इस समस्या से मुक्त हो जाऊँगा। मुझे प्रतिदिन रात आठ बजे उसके ‘त्रिधा महायोग केन्द्र’ पर आना पड़ेगा। पहली फरवरी को अवकाश था। तय हुआ कि दो फरवरी से मेरा उपचार शुरु होगा।

दो फरवरी की रात तय समय पर पहुँचा। पाँच लोग हॉल में अपनी-अपनी चादर बिछाए हुए और लगभग इतने ही लोग बैठे हुए विभिन्न योग-क्रियाएँ कर रहे थे। ओम सब पर नजर रखे हुए था। आवश्यकतानुसार रोक-टोक कर आवश्यक निर्देश दे रहा था। पहले दिन उसने मुझे पाँच योग-क्रियाएँ बताईं। सब बहुत आसान थीं। एक-दो बार करके दिखाईं। जहाँ आवश्यक हुआ, ओम ने सुधरवाया। ओम ने कहा कि पहले वह यह देखेगा कि उसने रोग की पहचान सही की है या नहीं। यह तय होने के बाद ही वह आगे बढ़ेगा। उसने कहा कि मेरी नियमितता जरूरी है और यह भी कि योग-क्रियाओं से मुझे जो भी अन्तर अनुभव हो, वह कितना ही बारीक और छोटा हो, मैं उसे तत्काल सूचित करूँ। इससे उसे रोग पहचानने में मदद मिलेगी। उसके बाद क्रम चल पड़ा। तीसरा सप्ताह समाप्त होते-होते मुझे अनामिका (रिंग फिंगर) के सुन्नपन में तनिक कमी अनुभव हुई। मैंने ओम को बताया तो वह खुश होने के बजाय सन्तुष्ट हुआ। उसने रोग की सही पहचान कर ली थी। उसने उस दिन मुझे तीन और योग-क्रियाएँ निर्देशित कर दीं। चौथे सप्ताह मुझे और अधिक राहत अनुभव हुई। लगा कि इस (अनामिका/रिंग फिंगर) के निचले दो पोरों का सुन्नपन चला गया है। मैंने चिकोटी काट कर देखा। मुझे चुभन अनुभव हुई। पहले ओम सन्तुष्ट हुआ था, अब मैं उत्साहित हो गया। ओम ने सुना तो उसने शून्य में हाथ जोड़कर प्रभु को धन्यवाद दिया। उस दिन उसने दो योग-क्रियाएँ बढ़ा दीं। इनकी संख्या अब दस हो गई थी। 
योग क्रियाएँ कराते हुए ओम। चित्र में एकदम सामने, हाथ उठाए।

अप्रेल के पहले सप्ताह तक मेरी यह अंगुली (अनामिका/रिंग फिंगर) पूरी तरह सामान्य हो गई। पहले मैं अंगूठे और दो अंगुलियों (तर्जनी/इण्डेक्स फिंगर और मध्यमा/मिडिल फिंगर) से स्कूटर का हेंडल पकड़ पा रहा था। अब तीन अंगुलियों से पकड़ पा रहा था।

कभी व्यस्तता, कभी आलस्य के कारण छुटपुट अनुपस्थितियों के साथ मेरी योग चिकित्सा चलती रही। मई बीतते-बीतते मेरी कनिष्ठिका (लिटिल फिंगर) के निचले दो पोर सामान्य हो चले। जून मध्य तक तीसरा पोर भी सामान्य हो गया। केवल नाखून की जड़ों में सुन्न रह गई थी जो जून का तीसरा सप्ताह आते-आते चली गई।

मेरे तईं यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। मेरा बहुत बड़ा तनाव दूर हो चुका था। मेरा बीमे का काम ऐसा कि मुझे दिन भर स्कूटर चलाना पड़ता है। सुन्न अंगुलियों के चलते, स्कूटर चलाने का मेरा आत्म-विश्वास डगमगाने लगा था। डरता था, कभी कोई दुर्घटना न हो जाए। लेकिन इस समय जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ, मेरी दोनों अंगुलियाँ 95 प्रतिशत से अधिक सामान्य हो चली हैं। कभी-कभार भारीपन अनुभव हो रहा है लेकिन सुन्नपन शून्यप्रायः है।

अभी-अभी ओम ने चार योग-क्रियाएँ और बढ़ा दी हैं। मैं नियमितता बनाए रखने की यथासम्भव चेष्टा करता हूँ। कभी-कभी व्यवधान आ जाता है। 
योग क्रियाएँ कराते हुए ‘भय्यू’ प्रणव। चित्र में एकदम सामने, धारीदार टी शर्ट पहने।

ओम के केन्द्र पर जाने के बाद धीरे-धीरे उसके बारे में मेरी जानकारियाँ बढ़ती गईं। उसने किसी से कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है न ही कोई ‘कोर्स’ किया है। वह स्वानुभूत, स्वप्रशिक्षित है। 1983 से उसने महायोग केन्द्र शुरु किया और 1989 से ‘योग थेरेपी चिकित्सा’ शुरु की। वह योग के जरिए स्नायु-तन्त्र आधारित चिकित्सा करता है। वह नाड़ियों को सहलाता, थपथपाता है, पुचकारता-फटकारता है। उसकी चिकित्सा से ठीक हुए मरीज पूरे देश में फैले हुए हैं। मैंने जानना चाहा कि उसने अब तक कितने लोगों का उपचार किया? उसने कहा - ‘शुरु-शुरु में तो मैंने भी मरीजों के नाम पते लिखने शुरु किए थे। लेकिन जब आँकड़ा एक हजार पार कर गया तो फिर लिखना बन्द कर दिया।’ उसने अपना रजिस्टर मेरे सामने सरका दिया। मैं एक नजर डालता हूँ। देश के विभिन्न प्रान्तों के हजार से अधिक नाम उसमें दर्ज हैं। इनमें अनेक नाम डॉक्टरों के हैं। मैंने फिर कुरेदा - ‘कोई तो आँकड़ा होगा?’ ससंकोच बोला - ‘कैसे बताऊँ बाबूजी! गिनती याद रखने की कोशिश ही नहीं की। हाँ, इस रजिस्टर में 92-93 तक के नाम हैं। इससे आप ही अन्दाज लगा लो।’ मैं भी क्या अनुमान लगाऊँ! स्ंक्षिप्त में कहूँ तो ‘हजारों’ रोगी ओम को दुआएँ दे रहे हैं। रजिस्टर में डॉक्टरों के नाम देखकर मुझे हैरत भी हुई थी और अविश्वास भी। लेकिन एक दिन मैंने देखा, सर्वाइकल स्पेण्डिलाइटिस के रोगी, अहमदाबाद के एक हड्डी रोग विशेषज्ञ उसके सामने बैठे हैं। वे ऑपरेशन नहीं कराना चाहते। ओम का नाम सुनकर रतलाम आए हैं। इसी तरह भोपाल के दो डॉक्टरों को भी ओम से मदद लेते हुए देखा। कभी-कभार, स्वस्थ हुए कुछ रोगी मिलने आ जाते हैं। उनसे मालूम पड़ता है, वे ओम के यहाँ पहली बार आए तब चल भी नहीं पाते थे। लेकिन ईलाज कराने के बाद दौड़ कर गए। 

ओम के हाथों मे यह यश देखकर मैंने कहा - ‘अपनी मार्केटिंग क्यों नहीं करते?’ वह विनम्रता और सन्तोष-भाव से बोला - ‘क्या जरूरत है बाबूजी इसकी? ईश्वर की कृपा से मेरा काम चल रहा है। मेरे भाग्य में जितना होगा, मिल कर रहेगा। जिस तरह लोगों ने आपको भेजा उसी तरह आप लोगों को भेजोगे। यही मेरी मार्केटिंग है।’
एक रोगी की चिकित्सा करते हुए ओम।

सूर्योदय से ओम का ‘त्रिधा महायोग केन्द्र’ शुरु हो जाता है जो रात नौ बजे तक चलता है। यहाँ सभी वर्गों के लोग एक जाजम पर बैठकर योग-क्रियाएँ करते हैं। महिलाओं का भी एक बेच चलता है। ओम का बेटा प्रणव (जिसे सब लोग ‘भय्यू’ के नाम से पहचानते, पुकारते हैं) ओम का सहायक बन कर अगले योग चिकित्सक के रूप में विकसित हो रहा है। जो भी ओम के यहाँ नियमित आता है, ‘भय्यू’ को लेकर चिन्तित हो जाता है। उसका सीधापन, उसकी सरलता चिन्ता में डाल देती है - ‘क्या होगा इसका? इस जमाने में इतना सीधा रहेगा तो लोग इसे बेच खाएँगे।’ सुन-सुनकर भय्यू और ओम हँस देते हैं। 

ओम के केन्द्र पर योग क्रियाएँ कर रहे कुछ लोग मुझे रोगी नही लगे। मैंने अपनी जिज्ञासा जताई तो बोला - आपने ठीक पहचाना बाबूजी! ये रोगी नहीं हैं। जैसे कुछ लोग ‘नशेड़ी’ होते हैं, उसी तरह ये ‘योगड़िए’ हैं। कोई आठ साल से तो कोई दस साल से आ रहा है। आप इन्हीं से पूछ लो।

ओम का ‘त्रिधा महायोग केन्द्र’ रतलाम में शास्त्री नगर में, डॉटर सैय्यद के निवास के पास है। उसका मोबाइल नम्बर  99075 32433 है। ओम की चिकित्सा रोगी से धैर्य, समय और नियमितता की माँग करती है। बाहर से आनेवाले रोगियों को अपने रहने-खाने की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है। 

जिला प्रशासन सहित रतलाम की अनेक संस्थाएँ, संगठन ओम को सम्मानित कर चुकी हैं। लेकिन ओम इन सबसे निस्पृह लगता है। उसकी बातों, क्रिया-कलापों से लगता नहीं कि ऐसे सम्मान उसे लुभाते, ललचाते हैं।

मुझसे ओम को एक कष्ट जरूर हो रहा होगा। उसके तमाम रोगी उसे गुरु-भाव से प्रणाम करते हैं, आते-जाते उसके पाँव छूते हैं। मैं ऐसा नहीं कर पा रहा। दो-एक बार सोचा भी। लेकिन नहीं कर पाया। पाँव छूने का भाव अन्तर्मन से उपजना चाहिए, दिखावे के लिए नहीं। मैं जब भी ओम को देखता हूँ तो मुझे वही युवा ओम नजर आता है जो जूडो-कराते को अपना केरीयर बनाना चाहता है और इसके लिए अपने पिता से आदरपूर्वक संघर्ष कर रहा है-चुपचाप लेकिन आत्मविश्वासपूर्वक, आँख से आँख मिलाते हुए। मैं और डॉक्टर मितना उसके लिए उसके पिताजी से झगड़ रहे हैं। उसके पिताजी हम दोनों को डाँट रहे हैं और हम दोनों हो-हो कर हँस रहे हैं।

फिलहाल तो मैं ओम को ‘ओम भैया’ कह कर ही काम चला रहा हूँ।
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उसे किसी से शिकायत नहीं थी

रेल का प्रस्थान का समय सवा आठ बजे है लेकिन मैं साढ़े सात बजे ही स्टेशन पहुँच गया हूँ। मेरा देहातीपन अब भी मेरे साथ बना हुआ है। ‘रेल छूट न जाए’ का डर घर से जल्दी निकाल देता है। जाती हुई रेल के अन्तिम डिब्बे के पीछे, डिब्बे के पूरे आकार में बने, अंग्रजी वर्णमाला के अन्तिम अक्षर एक्स को देखने की झुंझलाहट झेलने के बजाय स्टेशन पर राह देखना ज्यादा भला। स्टेशन पहुँचते-पहुँचते बरसात शुरु हो गई थी जो टिकिट लेकर प्लेटफार्म नम्बर दो पर पहुँचने तक तेज, मूसलाधार में बदल गई। दोहरी खुशी से लबालब हो गया। घर से देर से निकलने पर रेल छूटने के खतरे से भी बच गया और भीगने से भी। इससे पहले के दिनों में दो-चार बार पानी बरस चुका था लेकिन कहने भर को। आज की बारिश से लगा कि बरसात का मौसम शुरु हो गया है।

रेल, रतलाम से इन्दौर के बीच चलती है। रतलाम से इन्दौर आकर, दस मिनिट बाद ही वापस रतलाम के लिए चल देती है। रेल के आने के समय में होती कमी और बरसात की तेजी में मानो होड़ लग गई है। प्लेटफार्म पर लटकी घड़ी के चमकते अंक ज्यों-ज्यों 20:05 के नजदीक जा रहे हैं त्यों-त्यों बरसात तेज हो रही है। प्लेटफार्म पर जगह-जगह पानी टपकने लगा है। रतलाम की ओर जानेवालों की संख्या पल-पल बढ़ती जा रही है। बरसात ने प्लेटफार्म को छोटा कर दिया है। हर कोई सूखी जगह तलाश कर, भीगने से बचने की जुगत में है। रेल के आने से पहले ही रेल की क्षमता से कहीं अधिक लोग प्लेटफार्म पर मौजूद हैं। रेल के आने की सूचना मिलते ही सब प्लेटफार्म के किनारे पर खड़े हो गए हैं। हर कोई सबसे आगे रहने की कोशिश कर रहा है। लोग इस तरह खड़े हैं मानो पूरी रेल खाली आएगी और सबको अपने में समा लेगी। लेकिन सब यह भी जानते हैं कि ऐसा होगा नहीं। 

रेल आती है। खचाखच भरी है। बैठनेवालों में बेचैनी फैल जाती है। बैठने की जगह मिलेगी भी या नहीं? बाल-बच्चों के साथवाले अधिक चिन्तित हो रहे हैं। रेल के रुकते ही संघर्ष शुरु हो जाता है। पहले कौन सफल हो - उतरनेवाले या चढ़नेवाले। डिब्बों के दरवाजे सँकरे हो जाते हैं। वहाँ जाम लग जाता है। उतरनेवाले, चढ़नेवालों को डाँटना शुरु कर देते हैं। हमें नहीं उतरने दोगे तो चढ़ोगे कैसे? और चढ़ गए तो बैठोगे कहाँ, कैसे? इस बीच कुछ लोग खिड़कियों पास जाकर, अपने अंगोछे-टॉवेल अन्दर बैठे हुए यात्रियों की ओर फेंककर, अपने लिए जगह रोकने के लिए रिरियाते हैं। कुछ के लिए जगह रुक जाती है लेकिन अन्दर बैठे कई लोग इंकार कर देते हैं। कहते हैं कि उन्हें भी रतलाम ही जाना है जिसके लिए वे लक्ष्मीबाई नगर (इन्दौर से रतलाम की ओर, आनेवाला पहला स्टेशन) जाकर जगह रोक कर आ रहे हैं

युद्ध जैसा यह दृष्य देखकर मेरा हौसला पस्त हो जाता है। मोटापे की वजह से मैं यह सारी भागदौड़ नहीं कर पाता। इस तरह नहीं जूझ पाता। चुपचाप खड़ा हो जाता हूँ। जब सब लोग चढ़ जाते हैं, तब डिब्बे में चढ़ता हूँ। खूब अच्छी तरह जानता हूँ कि जगह नहीं मिलनेवाली। लेकिन आशावाद साथ नहीं छोड़ता। कई बार लोग इस उम्मीद में अपने पास एक-दो लोगों की जगह केवल इसलिए रोक लेते हैं कि कोई अपनेवाला आ जाएगा तो उसे जगह दे देंगे। सोचता हूँ, इतना बड़ा डिब्बा है। कोई न कोई ऐसा परिचित तो मिल ही जाएगा जिसने इसी तरह जगह रोक रखी होगी। कई बार ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्हें मैं नहीं जानता लेकिन जो मुझे जानते हैं।

लेकिन डिब्बे में चढ़ते ही यह आशावाद सबसे पहले साथ छोड़ देता है। यह पूरा डिब्बा नहीं है। डिब्बे के अन्तिम हिस्से को छोटे से डिब्बे का रूप दिया हुआ है। आमने-सामने के दोनों दरवाजों के पास, तीन लोगों के बैठनेवाली एक-एक सीट लगी हुई है-कुल जमा चार सीटें। याने बारह लोग ही बैठ सकते हैं। लेकिन डिब्बे में खुली जगह खूब सारी है। मैं नजर घुमा कर चारों ओर देखता हूँ। मर्द, औरतें, बच्चे मिला कर कम से कम तीस लोग तो होंगे ही। बैठे हुए लोगों के मुकाबले खड़े हुए लोग ज्यादा। इस बार मैं फटाफट निर्णय लेता हूँ। डिब्बे की दीवार से सटाकर अपनी चादर बिछा कर बैठ जाता हूँ। इतनी जगह मिल गई है कि टाँगे फैलाकर बैठ सकूँ। इस समझदारी और सफलता पर अपनी पीठ थपथपा लेता हूँ क्योंकि कुछ ही क्षणों बाद लोगों को यह सुविधा भी नहीं मिल पाती।

पीठ टिकाते ही पहला विचार मन में आया - ‘कौन अधिक गतिवान है? समय या मनुष्य?’ फिलवक्त तो मनुष्य ही अधिक गतिवान है। बैठ पाएँ हों या खड़े रहना पड़ रहा हो, दस मिनिट से पहले ही सबने अपनी-अपनी जगह ले ली। इतना ही नहीं, इतनी जल्दी सामान्य भी हो गए कि आपस में पूछने भी लगे - ‘कब चलेगी? सवा आठ तो बज गए!’ लेकिन सवाल दोहराया जाए, उससे पहले ही इंजन का हार्न बजता है और रेल चल पड़ती है। सब खुश हो जाते हैं, ‘वक्त पर चल दी है तो वक्त पर पहुँच भी जाएगी।’ 

रेल लक्ष्मीबाई नगर भी नहीं पहुँचती कि लोगों का बतियाना बन्द हो जाता है। सब शायद थके हुए हैं। बरसात का शोर भी बहुत ज्यादा है। कुछ लोग अभी से उनींदे होने लगे हैं। मेरे पास एक किशोर बैठा है। उससे सटा हुआ एक अधेड़। किशोर ने बैठते ही घुटने सिकोड़कर दोनों बाहों से गठरी बना ली है और सिर देकर सो गया है। अधेड़ ने पीठ टिका कर आँखें बन्द कर ली हैं। लोगों ने मानो मौन व्रत ले लिया है। और तो और, साथ-साथ बैठी हुई महिलाएँ भी चुप हैं। उनके साथ के बच्चे भी सयानों की तरह चुपचाप बैठे हैं। एक बच्चा तनिक जोर-जोर से पाँव पटक कर, रेल के पहियों के साथ तबले की तरह थाप मिला रहा है। वह पाँच-सात बार ही ऐसा कर पाता है कि उसकी माँ आँखें तरेर कर उसे घुड़क देती है। बच्चा सहम कर चुप बैठ जाता है।

अब डिब्बे में केवल बरसात की आवाज चहल-कदमी कर रही है। मैं आसपास देखता हूँ। चलती रेल के हिलते डिब्बे में सब कुछ मानो फ्रीज हो गया है। लेकिन नहीं। सब कुछ ऐसा नहीं है। डिब्बे के सामनेवाले आधे हिस्से में एक औरत खड़ी है। बाँहों में, लगभग एक बरस के बच्चेे को थामे। उसका पहनावा उसका धरम उजागर कर रहा है। निश्चय ही वह बहुत थकी हुई है। उसकी आँखें बराबर खुल नहीं पा रहीं। नींद से भरी हुई हैं। जब भी आँखें खोलती है, दयनीय मुद्रा में आसभरी नजर से देखती है, कहीं बैठने की जगह मिल जाए या कोई दयालु उसके लिए अपनी जगह छोड़ दे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। सीटों पर जो उनींदे बैठे हैं, वे तो देख ही नहीं पा रहे और गिनती के जो दो-चार लोग देखते हैं वे फौरन ही नजरें फेर लेते हैं। शायद खुद से ही डरते हैं-‘कहीं मन में आत्मघाती करुणा न उपज जाए।’ कोई उसकी मदद नहीं करता। न उसके धरमवाले न ही दूसरे धरमवाले। इस देखा-देखी से वह जल्दी ही उबर जाती है और नंगे फर्श पर बैठ जाती है। उसके पास बिछाने को कुछ नहीं। बच्चा शायद अपनी माँ का कष्ट समझ गया है। कुछ ही पलों में वह सो जाता है। सोये हुए बच्चे को गोद में लिए औरत भी बैठे-बैठे ही झपक जाती है। अब उसके चेहरे पर असीम शान्ति है। दुःख, थकान, पीड़ा कुछ भी नहीं है। 

बड़नगर में कई लोग उतरते हैं। लेकिन इतने नहीं कि उस औरत को और मुझे बैठने की जगह मिल जाए। हाँ, फर्श लगभग पूरा खाली हो गया है। अब कोई खड़ा हुआ नहीं है। बड़नगर से रतलाम का सफर लगभग एक घण्टे का है। लेकिन तब भी कोई उसके लिए जगह नहीं छोड़ता। सब बैठे हुए हैं। औरत, कपड़ों में लिपटे बच्चे को फर्श पर सुला देती है और एक सीट के कोने से माथा टिका कर सो जाती है।

रेल ने नौगाँव पार कर लिया है। अब रेल बीस मिनिट में ही रतलाम पहुँच जाएगी। लोग हरकत में आने लगे हैं। अपना-अपना सामान समेट रहे हैं। सबकी कोशिश रहेगी, सबसे पहले उतरें, भाग कर अपना वाहन पकड़ें और जल्दी से जल्दी घर पहुँच कर बिस्तर में दुबकें। लेकिन वह औरत वैसी की वैसी सोई हुई है। उसके पास कोई सामान नहीं है। न तो उसकी नींद खुल रही है न ही बच्चे की। 

रेल की गति धीमी हो गई है। रतलाम का आउटर सिगनल पार कर लिया है। लोग दरवाजे के पास पहुँच गए हैं। लेकिन दोनों माँ-बेटे जस के तस सोए हुए हैं। एक औरत से रहा नहीं जाता। सोई हुई औरत का कन्धा थपथपाते हुए, चिन्ता से डाँटते हुए कहती है - ‘अब तो उठ जा ए बेन। कब तक सोती रहेगी। रतलाम आ गया।’ औरत चमक कर जागती है। आँखें मसल कर सबसे पहले अपने बच्चे को देखती है। उसे सोया देख, मुस्कुरा देती है। लाड़ से गोद में लेती है और उठकर सबके पीछे खड़ी हो जाती है। उसकी शकल कह रही है, उसे और उसके बच्चे को जगह न देने के लिए उसे किसी से कोई शिकायत नहीं है। मैं भी अपनी चादर की घड़ी कर झोले में रखता हूँ और उस औरत के पीछे खड़ा हो जाता हूँ। मुझे कोई जल्दी नहीं है। मेरा स्कूटर स्टैण्ड पर रखा है। घर पर गरम रोटी तैयार मिलेगी।

रेल रुकती है। उतरनेवाले गिनती के हैं लेकिन फिर भी आपाधापी मच जाती है। लेकिन वह औरत बिलकुल भी जल्दबाजी नहीं करती। निश्चिन्त भाव से उतरती है। कुछ इस तरह मानो उसे लिवाने के लिए कोई बाहर खड़ा हो और घर पर गरम रोटी उसका भी इन्ताजर कर रही हो। हकीकत तो भगवान ही जाने किन्तु पता नहीं क्यों उसकी यह निश्चिन्तता मुझे खुश कर देती है।

सब यात्री उतर गए हैं। हमारा डिब्बा सबसे अखिर में था। प्लेटफार्म पर उतरनेवाला मैं अन्तिम यात्री हूँ। सब चले जा रहे हैं। मैं उस औरत के पीछे-पीछे चल रहा हूँ। सबको घर पहुँचने की उतावली है लेकिन वह शान्त भाव से, मन्थर गति से चल रही है।

रात के ग्यारह बजने वाले  हैं। रतलाम में बरसात हो चुकी है। वातावरण में ठण्डक घुल आई है। प्लेटफार्म पर नीरवता छाई हुई है।  सबके पीछे चलते हुए, उस औरत को देखते हुए मैं सोच रहा हूँ, सुख-दुःख और स्वार्थ का आपस में कोई रिश्ता होता है? इनका कोई धर्म होता है?   
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......वैसे ही सबके मनोरथ पूरे हों

यह, अचानक ही कोई मनोरथ पूरा हो जाने जैसा ‘सुखद हादसा’ था। मनोरथ भी ऐसा जिसके पूरा होने की उम्मीद तो छोड़िए, आशंका भी नहीं रह गई हो। मैं गया था केवल अपनी हाजरी दर्ज कराने लेकिन बैठा पूरे ढाई घण्टे।

कार्यक्रमों के उबाऊ संचालनों के कारण मैंने कार्यक्रमों मे जाना बन्द सा कर दिया है। संचालन प्रायः ही ‘नाक पर नथनी भारी’ जैसा होता है। संचालक, आयोजन को भूल, खुद को आगे ले आता है और अन्तिम क्षण तक आगे ही बनाए रखने में जुटा रहता है। उस पर कोढ़ में खाज जैसी दशा यह कि अकारण ही शेर-ओ-शायरी कुछ इस तरह घुसेड़ते रहता है मानो किसी डॉक्टर ने कह दिया हो। 

मैं उस संचालक को ‘आदर्श’ मानता हूँ जो ‘मैं’ का उपयोग न करे। मेरा मानना है कि किसी भी आयोजन में संचालक की अपनी कोई व्यक्तिगत हैसियत नहीं होती। लेकिन प्रायः प्रत्येक संचालक इस तरह पेश आता है मानो वही मेजबान हो। जबकि ऐसा होता ही नहीं है। उसकी जिम्मेदारी होती है-आयोजन को नायक बनाए, आयोजन को को सफल बनाए। लेकिन वह खुद को सफल, खुद को नायक बनाने में जुट जाता है और श्रोताओं के बीच खलनायक बन जाता है। इन्हीं सब बातों के चलते, मैं ऐसे संचालक की प्रतीक्षा करते-करते थक कर हताश हो गया जो केवल संचालक की तरह पेश आए। जो खुद को नेपथ्य में रखे। उस धागे की भूमिका निभाए जिसके सहारे बिखरे हुए फूल सुन्दर माला की शकल ले लेते हैं।

यह 30 मई की बात है। लघु पत्रिका ‘पर्यावरण डाइजेस्ट’ के प्रकाशन के तीन दशक पूरे होने के प्रसंग पर जलसा आयोजित था। पत्रिका के कर्ता-धर्ता और मैं एक ही मोहल्ले में रहते हैं। जलसा स्थल भी मोहल्ले में ही था। जलसे के समय पर ही भोपाल से मेरे कुछ मिलनेवाले पहुँचनेवाले थे। लेकिन मोहल्ले का मामला। टालना अशालीन ही नहीं आत्मघाती भी होता। उत्तमार्द्धजी को कहा कि भोपाल से आनेवालों को तनिक प्रतीक्षा करने को कह कर बैठा लें। सोचा था, मेजबान को शकल दिखाकर, हाजरी लगा कर जल्दी ही लौट आऊँगा। लेकिन प्रिय आशीष दशोत्तर ने, सर्वथा अनपेक्षित रूप से ऐसा नहीं होने दिया।

आशीष मेरे कस्बे का अब स्थापित साहित्यकार-गजलकार है। वह सम्मान सूचक सम्बोधनों का अधिकारी है। उसके लिए ऐसे ‘तू-तड़ाक’ जैसी भाषा मैंने नहीं वापरनी चाहिए। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ।  करूँगा तो असहज और कृत्रिम हो जाऊँगा और अपनी बात नहीं कह पाऊँगा। (आशीष मुझे क्षमा करे।)

आशीष अब किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा। गजल, कविता, कहानी, आलेख, जैसे विधाओं पर उसकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अंचल के अखबारों में उसे निरन्तर पढ़ना अब हमारी आदत में शुमार हो गया है। देश की ख्यात साहित्यिक पत्रिकाओं में उसकी रचनाएँ जगह पा रही हैं। साहित्य की वार्षिक रपटों/समीक्षाओं में उसकी पुस्तकें उल्लेखित की जाने लगी हैं। हमारा कस्‍बा उससे पहचाना जाने लगा है।लेकिन हममें से शायद ही किसी को यह सब एकमुश्त याद आता हो। वह ‘घर का जोगी जोगड़ा’ बने रहने को अभिशप्त है। मेरा कस्बा आए दिनों उसे भिन्न-भिन्न प्रकार के आयोजन का संचालन सौंपता रहता है। मुझे यह बहुत बुरा लगता है। लेकिन न तो आशीष कुछ कर सकता है न ही मैं। (आशीष की गजलें  आप ''आशीष 'अंकुर' की गजलें'' टेग के अन्‍तर्गत इस ब्‍लॉग पर पढ  सकते हैं।)

आयोजन में पहुँचा तो देखा, संचालन  आशीष के जिम्मे है। लेकिन चूँकि मुझे जल्दी ही लौटना था, लगभग उल्टे पाँव, सो मैंने तनिक भी ध्यान नहीं दिया। मेरा चित्त तो भोपाल से आनेवाले मित्रों में उलझा हुआ था।

‘नमस्कार। पर्यावरण डाइजेस्ट के इस आयोजन में आपका स्वागत है।’ कह कर आशीष ने शुरुआत की। पहले ही वाक्य ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। यह लीक से हटकर था। आम तौर पर कार्यक्रम संचालक ‘मैं आप सबका स्वागत करता हूँ।’ कहता है। लेकिन आशीष ने ऐसा नहीं कहा। मैं ढीला-ढाला बैठा था। अनायास ही तन कर बैठ गया। मेरा समूचा ध्यान आशीष के संचालन पर ही केन्द्रित हो गया। कार्यक्रम ज्यों-ज्यों अगली पायदान पर जा रहा था त्यों-त्यों मैं कुर्सी में धँसता जा रहा था। उद्बोधन के लिए वक्ता को आमन्त्रित करते समय ‘अब श्री फलाँ-फलाँ से सानुरोध निवेदन है कि हमें अपने उद्बोधन से लाभान्वित करें।’ जैसी शब्दावली वापर रहा था। संचालक प्रायः ही, उद्बोधन पूरा होने के बाद वक्ता की बात की संक्षेपिका प्रस्तुत करने का रोगी होता है। किन्तु आशीष ने अपनी विद्वत्ता जताने की यह मूर्खता एकबार भी नहीं की। और तो और, उसने किसी वक्ता के परिचय में या उसे वक्तव्य हेतु आमन्त्रित करते समय जबरन कोई शेर या कविता नहीं सुनाई। यह काम उसने किया जरूर लेकिन आवश्यक होने पर ही।

आशीष का यह ‘व्यवहार’ मुझे चौंका भी रहा था और लुभा भी रहा था। इसका असर यह रहा कि भोपाल से आनेवाले मेरे मित्र कब मेरे चित्त से उतर गए, मुझे मालूम ही नहीं हुआ। कार्यक्रम कम से कम ढाई घण्टे तो चला ही। लेकिन आशीष ने एक बार भी ‘मैं’ का उपयोग नहीं किया। यह असम्भवप्रायः काम आशीष सहजता से करता रहा। पता नहीं, सायास या अनायास। किन्तु मैं अपनी कहूँ। मैं होता तो शायद सायास भी ऐसा नहीं कर पाता।

पता ही नहीं चला कि कार्यक्रम कब पूरा हो गया। अन्तिम वक्ता के बैठते ही, आभार प्रदर्शन की औपचारिकता शुरु होने से पहले ही लोग उठने लगे तो मेरी तन्द्रा टूटी। मुझे अपने मेहमान याद आने लगे और मैं चुपचाप लौट आया।

आते हुए पूरे समय मैं, बरसों से कुँआरे बैठे अपने एक मनोरथ के पूरा होने के आनन्द से उल्लसित था। कुछ इस तरह से खुश था मानो किसी बच्चे को मनचाहा खिलौना मिल गया हो। 

दो दिन बाद मैंने आशीष को बधाई दी। उसकी यह विशेषता बताई तो ताज्जुब जताते हुए बोला - ‘ऐसा क्या? यह तो आपसे ही मालूम हो रहा है।’ उसने बताया कि उसने तो यह सब सहज भाव से ही किया था। सुनकर मुझे लगा, सहजता से किया तभी ऐसा हो पाया होगा। सायास करता तो कहीं न कहीं तो चूकता ही और उसका ‘मैं’ सामने आ जाता।

मैंने आशीष से कहा है कि उस आयोजन की पूरी रेकार्डिंग प्राप्त करे। विभिन्न विषयों पर बच्चों से बात करने के लिए मुझे यदा-कदा बच्चों के शिविरों में बुलाया जाता है। अगली बार किसी ऐसे शिविर में बुलाया गया तो इस रेकार्डिंग के अंश बच्चों को बताऊँगा और कहूँगा - ‘देखो! ऐसा होता है संचालन।’

जैसे मेरा मनोरथ पूरा हुआ, वैसे ही सबके मनोरथ पूरे हों।

(यह पोस्‍ट लिखते-लिखते मुझे, संचालकों से जुडे, दो-एक किस्‍से और याद आ गए। मौका मिलते ही लिखूँगा।) 

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(यहाँ दिया गया, आशीष का चित्र उसी आयोजन का है।) 

भेस से धर्म रक्षक काम से धर्म बैरी

त्रिपोलिया गेट से घर लौट रहा था। रास्ते में उत्तमार्द्धजी का फोन आया - ‘पपीता लेते आईएगा।’ मैं असहज हो जाता हूँ। ‘गृहस्थ’ बने इकतालीस बरस से अधिक हो गए लेकिन घर-गिरस्ती की अकल अब तक नहीं आई। एक ठेले पर पपीते नजर आए। रुक गया। बिना भाव-ताव किए ठेलेवाले से बोला - ‘भई, तेरे हिसाब से, ढंग-ढाँग के दो पपीते दे दे।’ दो-चार पपीते टटोल कर, दो पपीते निकाल, तराजू पर रखने लगा। मैंने ‘यूँ ही’ कहा - ‘मुझे सामान खरीदने की अकल नहीं है। तू जाने और तेरा राम जाने।’ सुनकर वह चिहुँक गया। उसके हाथ रुक गए। बोला - ‘अरे! आपने तो बात राम-ईमान पर ला दी बाबूजी!’ हाथ के दोनों पपीते रख दिए। पाँच-सात पपीतों को थपथपाया, सूँघा और खूब सावधानी से दूसरे दो पपीते निकाल, तराजू पर रख दिए। उसके चिहुँकने ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। उसका नाम पूछा। बोला - ‘भूरिया।’ मुझे लगा, झाबुआ जिले का आदिवासी है। वहाँ ‘भूरिया’ कुल नाम (सरनेम) बहुत सामान्य है। मैंने कहा - ‘वो तो है पर तेरा नाम क्या है भैया?’ बोला - ‘भूरिया खान’। अब मैं चिहुँका- खान और राम के नाम पर डर गया?  पहनावे, बोल-चाल से वह कहीं से ‘खान’ नहीं लग रहा था। मैंने उसे धन्यवाद दिया और चल पड़ा।

अगले दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। उत्तमार्द्धजी मधुमेही हैं। उन्होंने जामुन की फरमाइश की। माणक चौक में महालक्ष्मी मन्दिर की दीवारे के सहारे कुछ महिलाएँ जामुन ले कर बैठती हैं। पहली नजर में मुझे जामुन अच्छे नहीं लगे। आधे-आधे लाल, आधे-आधे काले। मैंने आधा किलो जामुन माँगे। उसने लापरवाही से जामुन तराजू पर रखे। अचानक ही मुझे कलवाली बात याद आ गई। मैंने कहा -‘मुझे जामुन की परख नहीं है। मरीज के लिए ले जा रहा हूँ। तू जाने और तेरा राम जाने।’ सुनते ही उसने, मानो घबराकर सारे जामुन वापस टोकरी में उँडेल दिए और घबरा कर बोली -‘अरे! राम! राम! बाबूजी। पहले ही कह देते!’ और एक-एक जामुन छाँट कर तराजू पर रखे। मैंने उसका नाम पूछा तो बोली - ‘गरीब का क्या नाम बाबूजी! आप किसी भी नाम से बुला लो।’

ये बातें यूँ तो रोजमर्रा की हैं लेकिन इन दिनों धर्म के नाम पर जो कुछ हो रहा है और राज्याश्रय में होने दिया जा रहा है, उन सन्दर्भों में मौजूँ और विचारणीय हैं। ये दोनों ‘छोटे लोग’ मुझे सर्वाधिक धार्मिक लगे। धर्म के नाम पर और धर्म रक्षा के नाम पर दंगा करनेवाले और निरपराध, निर्दोष लोगों के प्राण लेनेवाले यदि इन दोनों को देख लें तो उन्हें निश्चय ही अपने कुकर्मों पर शर्मिन्दगी हो। लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि जो कुछ वे कर रहे हैं वह खूब सोच-विचार कर, सोद्देश्य, सुनियोजित तरीके से कर रहे हैं। ‘धर्म’ उनकी चिन्ता बिलकुल ही नहीं है।

मेरे कस्बे के लोकव्यवहार पर श्वेताम्बर जैन समाज का भरपूर प्रभाव है। इतना कि मेरे कस्बे के निजी और सार्वजनिक आयोजनों की रसोइयों में प्याज-लहसुन का उपयोग नहीं होता। अपने जैन आमन्त्रितों की चिन्ता करते हुए, अजैनी भी अपने यहाँ जनम-मरण-परण पर बननेवाले भोजन में प्याज-लहसुन नहीं वापरता। श्वेताम्बर जैन समाज, पूरी सतर्कता और चिन्ता से ‘धर्म-पालन’ का ध्यान रखता है। मैंने एक बार पूछा - ‘धर्म-पालन से क्या अभिप्राय है? धर्म को पालना-पोसना या धर्म के निर्देशों का पालन करना?’ बहुत ही सुन्दर जवाब मिला - ‘दोनों। धर्म के निर्देशों का पालन होगा तो ही तो धर्म पलेगा-पुसेगा!’ सुनते ही मुझे जिज्ञासा हो आई - ‘कौन अधिक धार्मिक है? अपने धर्म के निर्देशों का पालन करनेवाला जैन या जैन की धार्मिक भावनाओं की चिन्ता करनेवाला अजैन?’ लेकिन अगले ही पल अपनी मूर्खता पर झेंप आ गई। धार्मिक होना तो बस धार्मिक होना होता है। कम धार्मिक या ज्यादा धार्मिक से क्या मतलब? जाहिर है, अपने धर्म के साथ ही साथ अपने साथवाले के धर्म की चिन्ता करना भी अपना धर्म है। इसी बात को गाँधी ने अपना आदर्श बनाया था - ‘जो सब धर्मों को माने वही मेरा धर्म।’ लेकिन गाँधी ने तो बहुत बाद में कहा। गोस्वामीजी बहुत पहले ही कह गए -

‘परहित सरिस, धरम नहीं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।’

जाहिर है, धर्म के नाम पर हत्याएँ करनेवाले केवल हत्यारे हैं, धर्म रक्षक बिलकुल नहीं। प्रत्येक धर्म, धर्म पर मर जाने की बात करता है, मारने की नहीं। किसी के प्राण लेना धर्म हो ही नहीं सकता। मैं जब भी धर्म के नाम हत्या का कोई समाचार पढ़ता हूँ तो हर बार मुझे, मरनेवाला ही धार्मिक लगता है। वह अपने धर्म के कारण, अपने धर्म के लिए ही मरा। उसे मारनेवाले तो अपने ही धर्म के दुश्मन हैं। वे अपने धर्म को ‘हत्यारा धर्म’ साबित करते हैं। लेकिन केवल हत्या करनेवाले ही क्यों? वे तमाम लोग भी हत्यारे ही हैं जो अपने धर्मानुयायियों का हत्या करते हुए चुपचाप देखते रहते हैं, मरनेवाले को बचाने आगे नहीं आते। पूछो तो मासूम जवाब मिलता है - ‘कैसे बचाते? वे मुझे भी मार देते।’ जाहिर है, किसी को बचाने का अपना धर्म उन्हें याद नहीं रहता और वे भी हत्यारों में शामिल हो जाते हैं। धर्म के लिए जान देनेवाले अब नहीं रहे। अब तो धर्म के नाम पर जान लेनेवाले, हत्यारे, अपराधी ही बचे हैं।

यह सब देख-देख कर मुझे लगता है, अब धर्म स्थलों में धर्म नहीं रह गया है। वहाँ तो केवल दिखावा और चढ़ावा रह गया है। चढ़ाई गई सामग्री को बाजार में बेच कर अपनी जेब भारी करने के व्यापार केन्द्र बन कर रह गए हैं। आठ-आठ, दस-दस दिनों तक चलनेवाले धार्मिक आयोजन/उपक्रम मुझे निष्प्राण, निरर्थक लगने लगते हैं। इनका कोई असर होता नजर नहीं आता। लगता है, ऐसे आयोजनों/उपक्रमों में और अपराधों में कोई प्रतियोगिता चल रही हो - देखें! कौन आग बढ़ता है?

जब मैं यह सब लिख रहा हूँ तभी मुझे समाचार मिला कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के दो जत्थे रास्ते से ही लौट आए हैं। चीन ने बाधा पैदा कर दी और अपने ही द्वारा जारी वीजा खारिज कर दिया। लेकिन लौटे हुए जत्थों के सदस्यों ने कोई हुड़दंग नहीं किया। और तो और, धर्म की ठेकेदारी करनेवालों की भी बोलती बन्द रही। किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत नहीं हुईं। सबको मालूम है कि यह दो राष्ट्रों के बीच का मामला है। यहाँ सचमुच में ‘राष्ट्र प्रथम’ है, धर्म नहीं। धर्म की दुकानदारी करनेवाले भली-भाँति जानते हैं कि वे कुछ भी कर लें, कुछ होना-जाना नहीं। लेकिन, अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों में ‘राष्ट्र’ की विवशताएँ अनुभव कर, अपनी जबानों पर ताला लगानेवालों को आन्तरिक सन्दर्भों में ‘राष्ट्र धर्म’ या कि ‘राष्ट्र प्रथम’ याद नहीं रहता। धर्म के नाम पर दंगे और हत्याएँ करनेवाले तमाम लोग भूल जाते हैं कि भारत एक ‘धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य’ है और उनके इन दुष्कृत्यों से पूरी दुनिया में भारत की यह छवि भंग होती है, बदनामी होती है, भारत के माथे पर कलंक लगता है, भारत का सिर शर्म से झुकता है।

देश का अपना कोई धर्म नहीं होता। यदि होता भी है तो केवल ‘लोक-कल्याण’। इससे कम या ज्यादा कुछ नहीं। धर्म के नाम पर उपद्रव करनेवाले चाहे जितने खुश हो लें लेकिन वे ‘धर्म रक्षक’ नहीं ‘धर्म के दुश्मन’ हैं। धर्म रक्षा का भार तो पपीता बेचनेवाले तमाम भूरिया खान और अनाम रहनेवाली जामुन बेचनेवाली तमाम महिलाओं के जिम्मे है। जिसे वे निष्ठापूर्वक उठा रहे हैं, निभा रहे हैं।
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 29 जून 2017 को प्रकाशित)

यह मुकदमा जीतना ही चाहिए

चेम्पियन्स ट्राफी के फायनल में भारत की हार के बाद, पाकिस्तान की जीत की खुशी में पटाखे छोड़ने और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगा कर, जश्न मना कर, ‘राष्ट्र की गरिमा के विपरीत कृत्य’ के आरोप में बुरहानपुर पुलिस ने 15 लोगों को गिरफ्तार किया। अपने प्रदेश की पुलिस पर गर्व हो आया। वर्ना कहीं हमारी पुलिस भी जम्मू-कश्मीर पुलिस की तरह ‘बन्‍दनयन’ होती तो ये देशद्रोही बच निकलते। मध्य प्रदेश की ही तरह जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा सरकार में है लेकिन वहाँ, पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते और भारतीय झण्डे को जलाते, हजारों लोग वहाँ की पुलिस को या तो नजर नहीं आते या वहाँ की पुलिस देख ही नहीं पाती। बुरहानपुर में लगे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ और जम्मू-कश्मीर में आए दिनों लग रहे ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारों के अर्थ और मकसद में निश्चय ही कोई गुणात्मक अन्तर होगा। वर्ना, राष्ट्र की गरिमा के विपरीत कृत्य पर वहाँ के भाजपाइयों का खून भी उबलता ही। मैं नहीं मानता कि ‘राष्ट्र प्रथम’ को जीवन ध्येय घोषित करनेवाला कोई भाजपाई ‘सत्ता’ के लालच में राष्ट्र विरोधी कोई हरकत बर्दाश्त कर लेता है।

बुरहानपुर के समाचार ने मुझे जिज्ञासु और उत्सुक बना दिया। मैं सोच रहा हूँ, इन पन्द्रह लोगों के विरुद्ध कोर्ट में क्या दलीलें दी जाएँगी! कहीं ऐसा न हो कि ये लोग ‘बाइज्जत बरी’ हो जाएँ! मेरे पास अपनी कुछ आशंकाएँ, कारण हैं।

पाकिस्तानी आतंकवाद ने हमारे अनगिनत सैनिकों के प्राण ले लिए हैं। यह सिलसिला थम नहीं रहा। शायद ही कोई दिन जाता हो जब पाकिस्तानी सेना या पाकिस्तान-पालित-पोषित-पल्लवित आतंकवादी हमले न करें।  जम्मू-कश्मीर का जनजीवन और अर्थ व्यवस्था ध्वस्तप्रायः है। लेकिन हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मनमोहन सरकार की तरह ही वाणी-वीर, शब्द-शूर बने हुए हैं। हमलों-हत्याओं की कड़ी निन्दा कर रहे हैं, आतंकियों को कायर कह रहे हैं और ‘हमारे जवानों का खून व्यर्थ नहीं जाएगा’ के घोष कर रहे हैं। मनमोहन सरकार की तरह ही हम अमेरीका से गुहार लगा रहे हैं, विश्व मंचों पर पाकिस्तान की असलियत उजागर कर रहे हैं। वादा तो ‘घर में घुस कर’ मारने का  था। लेकिन सब कुछ पहले जैसा ही हो रहा है। कुछ भी नहीं बदला। बदलता नजर भी नहीं आ रहा।

एक भाजपाई सांसद ने, पाकिस्तान को शत्रु-देश घोषित करने का निजी संकल्प प्रस्तुत किया। उम्मीद थी कि यह संकल्प न केवल विचारार्थ ले लिया जाएगा बल्कि सर्वानुमति से, पारित भी हो जाएगा। लेकिन मुझे विश्वास ही नहीं हुआ जब सरकार ने यह कह कर यह संकल्प लौटा दिया कि इस संकल्प से दोनों देशों के सहयोग-सौहार्द्र-मधुरता के सम्बन्धों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। मुझे डर है कि कहीं बुरहानपुर के राष्ट्रद्रोही सरकार के इस जवाब को अपने पक्ष में पेश न कर दें। वे कह न दें कि हार से व्यथित होने के बाद भी वे पाकिस्तान से भारत के मधुर सम्बन्धों की चिन्ता करने की, भारत सरकार की भावना को ही बल दे रहे थे।

मुझे बार-बार सुनने को मिलता है कि हमने पाकिस्तान को ‘अति अनुकूल राष्ट्र’ (मोस्ट फेवर्ड नेशन) का दर्जा दे रखा है। माना कि किन्हीं अन्तरराष्ट्रीय मजबूरियों के चलते हम पाकिस्तान को शत्रु देश घोषित नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन उसे दिया हुआ यह दर्जा वापस न लेने में कौन सी मजबूरी है? बुरहानपुर के, गिरफ्तार किए गए ये राष्ट्र-द्रोही, भारत के इस आधिकारिक व्यवहार के तथ्य को अपनी ढाल बना लें तो?

जिस तरह यूपीए सरकार ‘सोनिया नियन्त्रित-निर्देशित-संचालित’ थी उसी तरह एनडीए सरकार, ‘संघ’ द्वारा संचालित है। सब जानते हैं कि ‘राष्ट्र प्रथम’ ही ‘संघ’ का जीवनाधार है। इसी ‘संघ’ के प्रमुख मोहन भागवत, पाकिस्तान को ‘भारत का भाई’ घोषित कर चुके हैं।ये पन्द्रह ‘बुरहानपुरी’ कहीं भागवत को अपने गवाह के रूप में न बुलवा लें। पूछ न लें कि भाई की बेहतरी चाहना अपराध है? 

समूचा भारतीय जनमानस पाकिस्तान विरोधी भावनाओं से ओतप्रोत है। पाकिस्तान को लतियाने, जुतियाने का कोई पल हम नहीं गँवाते। मैं नहीं मानता कि हमारे प्रधानमन्त्री इन जनभावनाओं से अनजान होंगे। ‘संघ’ का निष्ठावान, समर्पित स्वयम्सेवक’ होना उनकी अनेक विशेषताओं, योग्यताओं में प्रमुख है। लेकिन पाकिस्तानी प्रधामन्त्री नवाज शरीफ के जन्म दिन के जलसे में भाग लेने के लिए वे, प्रधानमन्त्री की हैसियत में, बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम, अचानक (पता नहीं, बुलावे पर या बिना बुलाए) पाकिस्तान पहुँच जाते हैं। सद्भावना और मैत्री भाव से ‘शरीफ परिवार’ को उपहार देते हैं। बदले में अपनी माँ के लिए नवाज से साड़ी स्वीकारते हैं। सारी दुनिया भौंचक रह जाती है। फिर सम्हलती है और मोदी के इस मैत्री-भाव की प्रशंसा करती है। जाहिर है, वे शत्रु-भाव से तो नहीं ही गए होंगे। बुरहानुपर के ये पन्द्रह लोग, कहीं मोदी के इस सौजन्य-व्यवहार को अपनी ढाल न बनालें।

मनमोहन सिंह सरकार के समय, मौजूदा सरकार से जुड़े तमाम लोग ‘आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते’ और ‘पाकिस्तान को पाकिस्तान की भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए’ का तर्क आसमान पर चस्पा किए हुए थे। मोदी सरकार आने के बाद सबको विश्वास था कि अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा और देश पाकिस्तानी आतंकवाद से मुक्ति पा लेगा। लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। विदेश मन्त्री सुषमा स्वराज ने, कम से कम दो बार संसद में कहा कि बात किए बिना आतंकवाद से मुक्ति के रास्ते तलाश नहीं किए जा सकते। बुरहानपुर के ये पन्द्रह राष्ट्रद्रोही कहीं सुषमा स्वराज की इस बात को अपने पक्ष में न ‘घुमा’ लें। 

चेम्पियन्स ट्राफी के फायनल के दौर में तमाम प्रखर राष्ट्रवादी बार-बार भारत को ‘पाकिस्तान का बाप’ कह रहे थे। क्या यह मुमकिन नहीं कि बुरहानपुर में गिरफ्तार ये लोग कहें कि टूर्नामेण्ट के उस दौर में उपजे पितृभाव के अधीन वे बेटे की जीत का जश्न मना रहे थे या कि ‘फादर्स डे’ पर, बेटे से मिले उपहार का उल्लास प्रकट कर रहे थे? 

पाकिस्तान को लेकर हमारे सरकारी और सार्वजनिक व्यवहार का यह विरोधाभास मुझे दहशत में डाले हुए है। मेरी जानकारी में, पाकिस्तान के सन्दर्भ में राष्ट्रद्रोह का यह पहला मामला है। इसके दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। अपनी आशंकाओं के बीच मुझे एक ही बात राहत दती है - अभियोजन तो ये सारी बातें अधिक अच्छी तरह जानता ही होगा। और इन सबकी काट भी उसके पास होगी ही। बस! यही  मेरा आशा-तन्तु है।

लेकिन इसके समानान्तर मुझे कुछ बातें और नजर आ रही हैं। पाकिस्तान नहीं रहेगा तो हम लोग फिर ‘पाकिस्तानी’ कह कर किसे चिढ़ा पाएँगे? क्या कह कर मुसलमानों को देशद्रोही आरोपित कर पाएँगे? अभी तो बात-बात में हम जिसे भी देशद्रोही घोषित कर देते हैं, उसे पाकिस्तान भेजते रहते हैं। यदि पाकिस्तान सचमुच में मुर्दाबाद हो गया तो फिर हम ऐसे देशद्रोहियों को कहाँ भेजेंगे? अभी तो पाकिस्तानी और देशद्रोही पर्याय बने हुए हैं। पाकिस्तान सचमुच में मुर्दाबाद हो गया तो देशद्रोहियों को किस देश का नागरिक बताएँगे? कभी-कभी तो लगने लगता है कि हम भले ही ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहें, लेकिन अपनी देशभक्ति, अपना राष्ट्रप्रेम दिखाने के लिए पाकिस्तान हमारी जरूरत है। यदि पाकिस्तान ही नहीं रहेगा तो हमारी देशभक्ति का क्या होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि पूनम को पूनम बने रहने के लिए जिस तरह से अमावस की जरूरत होती है उसी तरह हमारी देशभक्ति के लिए पाकिस्तान जरूरी है?

लेकिन इस परिहास को छोड़, मुद्दे की बात पर आएँ। बुरहानपुर का मुकदमा हम सबके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन गया है। अच्छा सोचें और इसके अनुकूल फैसले की प्रतीक्षा करें। 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 22 जून 2017 को प्रकाशित)

धर्म मूल्यवान बनाता है, बिक्री-मूल्य नहीं बढ़ाता

आनन्द अभी-अभी गया है। मुझे फटकार कर। उम्र में मेरे बड़े बेटे से बरस-दो बरस ही बड़ा होगा, किन्तु डाँटता-फटकारता है बड़े भाई की तरह। आते ही शुरु हो गया - ‘आपका तो भगवान ही मालिक है। पता नहीं, क्या-क्या सनकें पाल लेते हैं! अब यह भी कोई बात हुई कि अखबार-टीवी का बॉय काट किए बैठे हैं! इन्हें क्या फरक पड़ेगा? फरक पड़ेगा तो केवल आपको। दीन-दुनिया से कटे रहेंगे। लीजिए! एक खबर है। आपके मिजाज की। तबीयत खुश हो जाएगी। अखबार पढ़ रहे होते तो पाँच-सात दिन पहले ही खुश हो जाते।’ कहते हुए एक अखबार मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं कुछ नहीं बोला। मुस्कुराते हुए, हाथ बढ़ाकर अखबार ले लिया।

अखबार आठ दिन पुराना है-पाँच जून, सोमवार का। पहले पृष्ठ पर सदैव की तरह विज्ञापनी-नकाब (जेट) है। मैं मुखपृष्ठ खोलता हूँ।  समाचार देखने की कोशिश करूँ, उससे पहले ही आनन्द बोला - ‘यहाँ नहीं। अच्छा समाचार है। मुखपृष्ठ पर कैसे मिलेगा? अन्दर है। ग्यारहवें पेज पर।’ और खुद ने ही खोलकर पन्ना मेरे सामने फैला दिया। समाचार का शीर्षक पढ़कर तबीयत वाकई में खुश हो गई - ‘गांव वालों ने मंदिर-मस्जिद से खुद उतारे लाउडस्पीकर, बोले- झगड़े जड़ खत्म’। समाचार रंगीन और सचित्र है। चार कॉलम समाचार को तीन कॉलमों में, पन्ने के निचलेवाले हिस्से में, प्रमुखता से छापा है। 

समाचार के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के थाना भगतपुर के गाँव थिरियादान के हिन्दुओं-मुस्लिमों ने खुद ही मन्दिर और मस्जिद से लाउडस्पीकर उतार कर पुलिस को सौंप दिए और तय किया कि गाँव में होनेवाले किसी भी धार्मिक काम-काज मे लाउडस्पीकर नहीं लगाया जाएगा। लाउडस्पीकर को लेकर गाँव में प्रायः ही विवाद होता और हर बार मामला गर्मा जाता। गाँववाले परेशान हो गए। गाँव के ही कुछ बुजुर्गों ने फैसला लिया कि ‘झगड़े की इस जड़ को ही खत्म कर दिया जाए’। ‘आनेवाले समय में कोई विवाद न हो, आनेवाली पीढ़ियाँ कोई मनमुटाव नहीं रखें और भाईचारा निभता रहे।’ 30 मई शनिवार को ग्राम प्रधान सुनीता रानी की मौजूदगी में सर्वानुमति से फैसला लिया और लिखित रूप में पुलिस थाने में दिया ताकि ‘सनद रहे और वक्त-जरूरत काम आए’। पंचायत में कहा गया गीता या कुरान, किसी में नहीं लिखा कि ऊपरवाले की इबादत लाउडस्पीकर से ही होनी चाहिए।

मैंने गूगल पर तलाशा तो पाया कि थिरियादान प्रायः ही साम्प्रदायिक विवादों में रहता आया है। जिला मुख्यालय मुरादाबाद से 25 किलो मीटर दूर है। गाँव की आबादी लगभग दो हजार है। हिन्दू आबादी 70 प्रतिशत और शेष 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। 

समाचार मैंने दो-तीन बार पढ़ा और विचार में पड़ गया। इन दो हजार लोगों ने बहुत जल्दी ‘झगड़े की जड़’ तलाश कर ली। संकट शायद आदमी को बुद्धिमान बना देता होगा क्योंकि वह सब पर समान रूप से आता है। वह हिन्दू-मुसलमान में फर्क नहीं करता। बार-बार के साम्प्रदायिक विवादों से उपजे संकटों ने इन लोगों को समझदार बना दिया। इन्हें समझ आ गई कि लाउडस्पीकर पूजा-इबादत के लिए जरूरी नहीं और न ही इनका उपयोग धार्मिक है। ‘क्योंकि भगवान की आराधना करने का यह तरीका पौराणिक नहीं है।’ और यह कि ‘किसी भी धर्म में नहीं लिखा कि लाउडस्पीकर से ही पूजा होगी।’  इन लोगों को अपने धार्मिक दबदबे के मुकाबले भावी पीढ़ियों की, उनके भाईचारे से रहने की चिन्ता अधिक हुई। उन्हें मालूम तो पहले से था लेकिन अनुभव अब किया कि लाउडस्पीकर से पूजा-इबादत करना धार्मिक-पौराणिक प्रावधान नहीं है,  ऊपरवाला तो अपने बन्दों का मौन भी साफ-साफ सुन लेता है। थिरियादान के, गिनती के इन लोगों ने अपनी भावी सन्ततियों की शान्ति, सुख, कुशल की चिन्ता की। 

तो क्या थिरियादान के ये लोग अब धार्मिक नहीं रहे? अधर्मी हो गए? निश्चय ही नहीं। ये सब धार्मिक तो पहले भी थे ही किन्तु तब ‘कट्टर धार्मिक’ या ‘धर्मान्ध कट्टर’ थे। इन्होंने अपनी-अपनी धर्मान्धता या कि कट्टरता छोड़ी। धर्म नहीं। समाचार की शब्दावली ध्यान देने योग्य है। गाँववालों ने लाउडस्पीकर को ‘झगड़े की जड़’ कबूल किया। कबूल किया कि देव-आराधना या कि इबादत के लिए लाउडस्पीकर की जरूरत नहीं। अनुभव किया कि गाँववालोें में मनमुटाव का कारण उनका ईश्वर, उनका खुदा, उनका धर्म या उनकी पूजा पद्धति नहीं, यह लाउडस्पीकर ही है। उन्होंने  अनुभव किया कि वे अपने धर्म के साथ ही सुख से रह सकते हैं, लाउडस्पीकर या ऐसे ही किसी अन्य बाहरी उपकरण के साथ नहीं।

वस्तुतः, धर्म तो मनुष्य को अधिक मूल्यवान बनाता है लेकिन मनुष्य अपने मूल्यवान होने को जता कर, उसके कारण और उसके आधार पर अपनी पहचान जताना चाहता है। तब वह ‘धार्मिक होने’ के मुकाबले ‘धार्मिक दीखने’ को सर्वोच्च प्राथमिकता जितना महत्वपूर्ण मान बैठता है। यहीं से मुसीबत शुरु होती है। मनुष्य जैसे ही अपने ‘मूल्यवान होने’ को जताना चाहता है वैसे ही खुद को ‘बिक्री योग्य’ घोषित कर बिकने के लिए बाजार में आ बैठता है। लेकिन बाजार का अपना चलन है। वहाँ तो ‘बेहतर’ या फिर ‘सस्ता’ ही खरीदा जाता है। बाजार में तो हर आदमी से बेहतर और हर आदमी से सस्ता आदमी उपलब्ध होता है। ऐसे में, हर कोई खुद को सर्वाधिक धार्मिक दिखाने के चक्कर में सबसे सस्ता होने की प्रतियोगिता में आ जाता है। तब पाखण्ड और प्रदर्शन की प्रतियोगिता अपने आप शुरु हो जाती है। ऐसे में उसका मूल्यवान होना अपना मूल्य खो देता है। इसके साथ ही साथ एक प्रक्रिया और शुरु हो जाती है - अनुयायियों के आचरण के आधार पर धर्म का मूल्यांकन। तब ही दुनिया किसी धर्म को अच्छा या बुरा तय करती है। यह सचमुच में रोचक विसंगति है कि जो धर्म मनुष्य को मूल्यवान बनाता है वही मनुष्य अपने (आचरण से) धर्म को लोकोपवाद की विषय वस्तु बना देता है।

धर्म आदमी को मूल्यवान बनाता है, उसका ‘बिक्री मूल्य’ नहीं बढ़ाता। धर्म यदि ‘बिक्री मूल्य’ बढ़ाता होता तो थिरियादान का यह समाचार देश के तमाम अखबारों में पहले पन्ने पर जगह पाता और तमाम चेनलों पर कई दिनों तक छाया रहता। किन्तु निश्चय ही ऐसा नहीं हुआ होगा। वर्ना आनन्द के बताने से पहले ही यह सब मुझे बहुत पहले ही मालूम हो चुका होता। 

धर्म आत्म-शुद्धि का, आत्मोन्नयन का उपकरण है, मुनाफे का नहीं। यह न तो खुद बिकता है न ही किसी का बिक्री मूल्य बढ़ाता है। बिक्री मूल्य और बिक्री तो दिखावे से ही बढ़ती है। उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में ‘विज्ञापन’ यह दिखावा है और धर्म के मामले में ‘पाखण्ड’ और ‘प्रदर्शन’। अधिकांश सरकारी स्कूलों में न तो बिजली है न पीने के पानी की व्यवस्था और न ही शौचालयों की।  भण्डारे पर लाखों रुपये खर्च करनेवाले किसी ‘धार्मिक-दानी’ से अनुरोध कीजिए कि वह यह रकम किसी एक स्कूल पर खर्च कर, समस्याओं का स्थायी निदान करने का पुण्य लाभ ले ले। वह तत्क्षण इंकार कर देगा। क्योंकि स्कूल में दिया पैसा किसी को नजर ही नहीं आएगा और उसकी वाह वाही नहीं होगी। यह इसलिए कह रहा हूँ कि धार्मिकों-दानियों से ऐसा अनुरोध कर इंकार सुन चुका हूँ। 

वस्तुतः, थिरियादान के लोगों को ‘आचरण’ और ‘प्रदर्शन’ का अन्तर समझ में आ गया। उन्होंने महसूस कर लिया कि ‘आचरण’ से ही उद्धार है, ‘प्रदर्शन’ से नहीं। धार्मिक कट्टरता या कट्टर धर्मान्धता से मुक्ति पाकर, उन्होंने आचरण को अपनाया। उन्होंने अपने लिए सुख-शान्ति ही नहीं जुटाई, अपने-अपने धर्म का मान भी बढ़ाया।

यही तो धर्म है! 
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(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल में, 15 जून 2017 को प्रकाशित)

.........हम उन्हें बर्बर कहते हैं

प्रकाण्ड इतिहासज्ञ पण्डित डॉ. रघुबीर प्रायः फ्रांस जाया करते थे। वे सदा फ्रांस के राजवंश के एक परिवार के यहाँ ठहरा करते थे। उस परिवार में ग्यारह साल की एक सुन्दर लड़की भी थी। वह भी डॉ.रघुबीर की खूब सेवा करती थी। अंकल-अंकल बोला करती थी।

एक बार डॉ. रघुबीर को भारत से एक लिफाफा प्राप्त हुआ। बच्ची को उत्सुकता हुई- ‘देखें तो भारत की भाषा की लिपि कैसी है!’ उसने कहा- ‘अंकल! लिफाफा खोलकर पत्र दिखाएँ।’ डॉ. रघुबीर ने टालना चाहा। पर बच्ची जिद पर अड़ गई।

डॉ. रघुबीर को पत्र दिखाना पड़ा। पत्र देखते ही बच्ची का मुँह लटक गया- ‘अरे! यह तो अँगरेजी में लिखा हुआ है! आपके देश की कोई भाषा नहीं है?’ डॉ. रघुबीर से कुछ कहते नहीं बना। बच्ची उदास होकर चली गई। माँ को सारी बात बताई। 

दोपहर में हमेशा की तरह सबने साथ साथ खाना तो खाया, पर रोज की तरह उत्साह, चहक-महक नहीं थी। गृहस्वामिनी बोली- ‘डॉ. रघुबीर! आगे से आप किसी और जगह रहा करें। जिसकी कोई अपनी भाषा नहीं होती, उसे हम फ्रेंच लोग, बर्बर कहते हैं। ऐसे लोगों से कोई सम्बन्ध नहीं रखते।’

गृहस्वामिनी ने उन्हें आगे बताया- “मेरी माता लोरेन प्रदेश के ड्यूक की कन्या थी। लोरेन प्रदेश की भाषा फ्रेंच थी। प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी ने इस पर कब्जा कर लिया। जर्मन सम्राट ने वहाँ फ्रेंच के माध्यम से शिक्षण बन्द कर, जर्मन भाषा थोप दी। फलतः प्रदेश का सारा कामकाज एकमात्र जर्मन भाषा में होने लगा। फ्रेंच के लिए वहाँ कोई स्थान नहीं रह गया। विद्यालयों में भी शिक्षा का माध्यम जर्मन भाषा ही थी।

“मेरी माँ उस समय ग्यारह वर्ष की थी और सर्वश्रेष्ठ कान्वेण्ट विद्यालय में पढ़ती थी। एक बार जर्मन साम्राज्ञी कैथराइन, लोरेन प्रदेश के दौरे पर आईं। उस विद्यालय का निरीक्षण करने आ पहुँची। मेरी माता अपूर्व सुन्दरी होने के साथ साथ अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि भी थीं। सब बच्चियाँ नए कपड़ों में सजधज कर आई थीं। उन्हें पंक्तिबद्ध खड़ा किया गया था। बच्चियों के व्यायाम, खेल आदि प्रदर्शन के बाद साम्राज्ञी ने पूछा कि क्या कोई बच्ची जर्मन राष्ट्रगान सुना सकती है?

“मेरी माँ को छोड़ वह किसी को याद न था। मेरी माँ ने उसे ऐसे शुद्ध जर्मन उच्चारण के साथ इतने सुन्दर ढंग से सुनाया कि कोई जर्मन भी नहीं सुना पाता। साम्राज्ञी बहुत खुश हुई। उन्होंने बच्ची से कुछ इनाम माँगने को कहा। बच्ची चुप रही। बार बार आग्रह करने पर वह बोली- ‘महारानी जी, क्या जो कुछ मैं माँगूँ, वह आप देंगी?’ साम्राज्ञी ने उत्तेजित होकर कहा- ‘बच्ची! मैं साम्राज्ञी हूँ। मेरा वचन कभी झूठा नहीं होता। तुम जो चाहो माँगो।’ इस पर मेरी माता ने कहा- ‘महारानी जी! यदि आप सचमुच अपने वचन पर दृढ़ हैं तो मेरी केवल एक ही प्रार्थना है कि अब से इस प्रदेश में सारा काम केवल फ्रेंच में हो, जर्मन में नहीं।’

“यह, सर्वथा अप्रत्याशित माँग  सुनकर साम्राज्ञी पहले तो आश्चर्यकित रह गई, किन्तु फिर क्रोध से लाल हो उठीं। वे बोलीं- ‘लड़की! नेपोलियन की सेनाओं ने भी जर्मनी पर कभी ऐसा कठोर प्रहार नहीं किया था, जैसा आज तूने शक्तिशाली जर्मनी साम्राज्य पर किया है। साम्राज्ञी होने के कारण मेरा वचन झूठा नहीं हो सकता, पर तुम जैसी छोटी सी लड़की ने इतनी बड़ी महारानी को आज पराजय दी है, वह मैं कभी नहीं भूल सकती। जर्मनी ने जो अपने बाहुबल से जीता था, उसे तूने अपनी वाणी मात्र से लौटा लिया। मैं भली-भाँति समझ गई हूँ कि लारेन प्रदेश अब अधिक दिनों तक जर्मनों के अधीन न रह सकेगा।’ यह कहकर महारानी अतीव उदास होकर वहाँ से चली गई।” 

गृहस्वामिनी ने कहा- ‘डॉ.रघुबीर! इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मैं किस माँ की बेटी हूँ। हम फ्रेंच लोग संसार में सबसे अधिक गौरव अपनी भाषा को देते हैं। क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र प्रेम और भाषा प्रेम में कोई अन्तर नहीं। हमें अपनी भाषा मिल गई। और आगे चलकर हमें जर्मनों से स्वतन्त्रता भी प्राप्त हो गई।’ 
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(सौजन्य: वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, मुम्बई)

आईए! मरें। ताकि स्वर्ग देख सकें

जब भी किसी फालतू की बहस से बचना चाहता हूँ, दोनों हाथ जोड़कर कह देता हूँ - ‘इस मामले मे मुझे कुछ नहीं पता। जो जितना जाने, उतना दुःखी हो। मुझे अज्ञान का सुख भोगने दीजिए।’ लोग हँस कर मुझे छोड़ देते हैं और मैं अर्थहीन, निकम्मी बहस का आनन्द लेने लगता हूँ। अनेक बार कहता हूँ - ‘मुझे समझदार नहीं बनना। समझदार की मौत है।’ लेकिन आज जब शेखरजी से बात हुई तो, बचाव के अपने इन कमजोर बहानों पर झेंप हो आई। अज्ञान का सुख तो हो सकता है। किन्तु इसके दण्ड तो भुगतने ही होते हैं। इसमें यदि आलस जुड़ जाए तो हालत ‘कोढ़ में खाज’ जैसी हो जाती है। तब हम दण्ड ही नहीं, दुःख भी भोगते हैं।

शेखरजी को आप भूले नहीं होंगे। नीमच जैसे दूरदराज के  मझौले कस्बे में बैठकर सूचना का अधिकार के जरिए वे ‘व्यवस्था’ के लिए असुविधाएँ पैदा करते रहते हैं। जिन्हें हम ‘छोटी-छोटी बातें’ मान कर ‘यह तो चलता है’ कह कर अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं, उन्हीं की जानकारी माँग कर ‘व्यवस्था’ के कपड़े उतारते रहते हैं। देश के शिक्षित लोगों के एक प्रतिशत लोग भी यदि शेखरजी की तरह सजग और सक्रिय हो जाएँ तो मेरा दावा है कि देश की नौकरशाही और अफसरशाही घुटनों पर आकर ‘त्राहिमाम्! त्राहिमाम्!’ करते हुए, साष्टांग मुद्रा में नजर आए। बस! शर्त यही है कि हम शेखरजी की तरह जानकारियों से वाकिफ, चौकन्ने और सक्रिय बने रहें।

सरकार को चुकाया पैसा या कि सरकार से उसकी अव्यवस्था का जुर्माना वसूलना असम्भव नहीं तो आसान भी नहीं। शेर के मुँह में हाथ डालकर सामान निकालने जैसा है। वसूलने में सरकार जितनी सख्ती, आक्रामता, निर्ममता बरतती है, चुकाने में उससे हजार गुना पीड़ा होती है सरकार को। लेकिन शेखरजी एक बार यह ‘पराक्रम’ कर चुके।

सन् 2016 की, आठ और नौ नवम्बर की सेतु-रात्रि को, नीमच टेलिफोन एक्सचेंज की केबल ट्रेंच में आग लग गई। फलस्वरूप नीमच के विभिन्न इलाकों के लेण्ड लाइन टेलिफोन तीन दिन से लेकर दस दिनों तक बन्द रहे। शेखरजी का फोन भी इन में शामिल था। 

शेखरजी के पास स्मार्ट फोन तो है किन्तु वे खुद अब तक स्मार्ट नहीं बन पाए। ठेठ देशी आदमी ही हैं - लेण्ड लाइन फोन पर बात करना, अपना काम निपटाना उन्हें अधिक सुखद और सुविधाजनक लगता है। ऐसे में फोन ठप्प याने शेखरजी ठप्प। परेशानी से चिढ़ उपजी और इसी से उपजी उत्सुकता - ऐसी स्थिति के लिए उपभोक्ताओं के लिए कोई राहत है या नहीं? वे जुट गए। बीएसएनएल की जनम-पत्री बाँची। वहाँ कुछ नहीं मिला तो ‘भारतीय टेलिफोन नियामक अभिकरण’ याने ‘ट्राई’ के कागज खँगाले। बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ी। शेखरजी की मुराद पूरी हो गई। ट्राई द्वारा निर्धारित सेवाओं के ‘गुणवत्ता मानक’ (बेंचमार्क) के अनुसार यदि कोई टेलिफोन तीन दिन से अधिक एवम् सात दिन से कम अवधि के लिए खराब हो जाता है तो उस उपभोक्ता को बिल में सात दिनों के किराए के बराबर रकम की छूट मिलती है।  सात दिन से पन्द्रह दिन की अवधि के लिए  पन्द्रह दिनों के किराए के बराबर रकम की और पन्द्रह से तीस दिनों की अवधि के लिए एक माह के किराए की रकम के बराबर छूट मिलती है। 

ये उल्लेख देखकर शेखरजी खुद की पीठ ठोक रहे थे। उन्होंने लिखा-पढ़ी शुरु कर दी। जैसा कि होता है, उनकी बात सुनी ही नहीं गई। शेखरजी ने सीधे बीएसएनल की साइट पर शिकायत दर्ज की। वहाँ इसे हाथों-हाथ लिया गया। छूट उपलब्ध कराने की प्रक्रिया के सारे गलियारों से होते हुए नीमचवालों को आदेशित किया गया - ‘शेखरजी को नियमानुसार छूट की रकम वापस करें।’ नीमच बीएसएनएलवाले चकित थे। उन्हें ऐसे आदेशों की आदत नहीं। आदेश दो बार पढ़ा और शेखरजी को अगले बिल में लगभग साढ़े तीन सौ रुपयों की छूट दी गई।

शेखरजी ने किस्सा सुनाया तो मैंने पूछा - ‘बीएसएनल वालों का क्या कहना रहा?’ शेखरजी बोले - “सब अपनेवाले ही हैं। खुश ही हुए। किसी की जेब से तो कुछ जाना ही नहीं था। लेकिन एक ने कहा - ‘शेखरजी! और तो कुछ नहीं, आपने लोगों के लिए रास्ता खोल दिया। आपने हमारा काम बढ़ा दिया। अब हमें लिखा-पढ़ी ज्यादा करनी पड़ेगी। बुढ़िया मरी इस बात की तकलीफ नहीं। तकलीफ इस बात की है कि मौत ने रास्ता देख लिया।”

मैंने शेखरजी से कहा - ‘शेखरजी! आपको मेरी सौगन्ध! आप इस मौत को नीमच से लेकर दिल्ली तक के, छोटे से छोटे से लेकर सबसे बड़े तक, हर सरकारी दफ्तर का दरवाजा दिखा दीजिएगा। आपको पूरे देश की दुआएँ लगेंगी।’

बहुत अदब और संकोच से शेखरजी बोले - ‘नहीं सर! आप जानते हैं, चाह कर भी ऐसा कर पाना किसी एक के लिए मुमकिन नहीं। सरकारी व्यवस्था की यह मौत तो हर हिन्दुस्तानी की जेब में पड़ी है। हम लोग अपनी ही जेब में हाथ डालने की मेहनत करने को तैयार नहीं। अपने यहाँ स्वर्ग तो हर आदमी देखना चाहता है लेकिन मरने को कोई तैयार नहीं। और आप तो जानते ही हैं सर! मरे बिना स्वर्ग नहीं देखा जाता।’
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एक ने पहचान बताई दूसरे ने पहचान-पत्र

आज की यह पोस्ट श्री विजय शर्मा के खाते में। यह उन्हीं के कारण लिखी जा रही है और उन्हीं को समर्पित है।

उद्यमिता के दिनों में हमारे उद्यम का खाता ‘इन्दौर बैंक’
(जिसका पूरा/वास्तविक नाम स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर था जो अब भारतीय स्टेट बैंक बन चुका है) की औद्योगिक क्षेत्र शाखा में था। अभिरुचि  सम्पन्न श्री विजय नागर वहीं पदस्थ थे। उन्होंने बहुत जल्दी भाँप लिया कि मुझमें व्यापार-धन्धे की और लेजर, केश-बुक की कोई सूझ-समझ नहीं है। वे मुझे अपने पास बैठाते और अपना काम करते-करते कविता, गजल की बात करते। राहत इन्दौरी का नाम मैंने पहली बार उन्हीं से सुना था। उन्होंने ही शर्माजी से मेरा परिचय कराया।

अभी तो शर्माजी सेवा निवृत्त जीवन जी रहे हैं। लेकिन वे नौकरी में थे तब भी उन्होंने कभी बैंक, बैंकिंग और आँकड़ों की बात नहीं की। नागर साहब की तरह ही शर्माजी भी अभिरुचि सम्पन्न हैं और नागरजी की तरह ही, मित्रों को उनकी और खुद की मनपसन्द किताबें पढ़वाने का शौक है।

मैं सेंधवा से रतलाम लौट रहा था। टैक्सी, रतलाम से दस-बारह किलो मीटर पहले वाले टोल नाके पर रुकी हुई थी। तभी शर्माजी का फोन आया। टोल नाके पर रुकने की बात मालूम होने पर जोर से हँसे। बोले - ‘क्या संयोग है! अभी आपकी वही पोस्ट पढ़ रहा हूँ जिसमें आपने टोल नाके पर रोके जाने से गुस्साए विधायक की बात कही है।’ बात लम्बी हुई लेकिन बातों की बातों में उन्होंने, रोके जाने पर वीआईपी से जुड़े दो अनुभव सुनाए। दोनों का अपना-अपना रंग और अपना-अपना मजा है।

इन्दौर बैंक ने बेडमिण्टन का कोई आयोजन किया था। महू के एक बड़े सैन्य अधिकारी और नईदुनिया के प्रधान सम्पादक अभयजी छजलानी मुख्यतः आमन्त्रित थे। शिष्टाचार भेंट के दौरान सैन्य अधिकारी ने पूछा - ‘आपको मुझसे कोई मदद चाहिए तो बताईए।’ मिलनेवालों ने कहा - ‘गेट पर चेंकिंग के लिए आपके कुछ जवान दिलवा दीजिए।’ अधिकारीजी ने अपेक्षा से अधिक जवान तैनात करवा दिए।

गेट पर तैनात जवानों को बताया गया कि दो ही आधारों पर लोगों को अन्दर आने दें - आगन्तुक के पास टिकिट हो या फिर उसके शर्ट पर आयोजकों द्वारा उपलब्ध कराया गया, रिबिन का फूल लगा हो। जवानों ने सलाम ठोक कर आश्वस्ति दी - ‘बेफिकर रहिए। इसके सिवाय कोई अन्दर नहीं आ पाएगा। परिन्दा भी नहीं।’

आयोजक निश्चिन्त होकर चले गए। अब दरवाजे पर फौजी जवान ही थे। वे चुस्ती से अपना काम कर रहे थे। थोड़ी ही देर में अभयजी प्रवेश द्वार पर पहुँचे। उनके पास न तो टिकिट था न ही रिबिनवाला फूल। टिकिट खरीदने का तो सवाल ही नहीं और फूल अन्दर, कार्यक्रम के दौरान लगाया जानेवाला था। जवान ने कहा - ‘टिकिट प्लीज।’ अभयजी ने, उन्हें लानेवाले कार्यकर्ताओं की ओर देखा। एक बोला - ‘अरे! ये तो चीफ गेस्ट हैं।’ जवान ने अदब से कहा - ‘जरूर होंगे सर! लेकिन हम तो केवल आर्डर ओबे कर रहे हैं।’ कार्यकर्ता ने बुद्धिमता बरती। अपना फूल निकाल कर अभयजी की शर्ट पर लगा दिया। बोला - ‘अब तो ठीक?’ जवान ने अदब से ‘यस सर!’ कहते हुए आदर से अभयजी को प्रवेश दिया। अभयजी के पीछे-पीछे वह कार्यकर्ता सहज भाव से जाने लगा तो जवान ने रोक लिया। बोला - ‘टिकिट प्लीज!’ कार्यकर्ता पहले तो अचकचाया, फिर झुंझलाया। चिढ़ कर बोला - ‘अरे! तुमने देखा नहीं? अभी मैंने अपना फूल अभयजी को लगाया था?’ बड़ी अदब से जवान बोला - ‘यस सर। देखा। लेकिन आपके शर्ट पर रिबिन फ्लॉवर नहीं है।’ कार्यकर्ता समझदार था। फौजी जवानों से हील-हुज्जत करने के खतरे जानता होगा। अपने प्रवेश की व्यवस्था की और जवानों की तसल्ली के बाद अन्दर गया।

शर्माजी का सुनाया दूसरा किस्सा रंजक तो है ही, औपचारिक/आधिकारिक पहचान और वास्तविक पहचान का अन्तर और तैनात व्यक्ति की परिपक्वता का बहुत बढ़िया उदाहरण है।

रतोलियाजी उन दिनों मल्हारगंज (इन्दौर) थाने के टी आई थे। पुलिस अफसरी करते समय उनकी आवाज किसी कड़क पुलिस अफसर जैसी ही होती थी किन्तु उनकी आवाज वस्तुतः धीर- गम्भीर, मुलायम और उच्चारण सुस्पष्ट थे। दृष्टि बाधित बच्चों के लिए इन्दौर बैंक ने रतोलियाजी की आवाज में एक सीडी तैयार करवाई। वह सीडी देवास में विमोचित होनी थी। 

विमोचन समारोह में शामिल होने के लिए बैंकवाले (जिनमें शर्माजी भी शामिल थे ही) बैंक की कार में रतोलियाजी को लेकर देवास जा रहे थे। रास्ते में टोल नाके पर कार रुकी। ड्रायवर जेब से पैसे निकालने लगा तो रतोलिया जी ने टोका - ‘उससे कह दो कि अन्दर मल्हारगंज के टीआई साहब बैठे हैं।’ ड्रायवर ने आदेश का पालन किया। सुनकर टोलवाले कर्मचारी ने कार में झाँका। रतोलियाजी ने वर्दी नहीं पहन रखी थी। टोलवाले को अन्दर झाँकते देख, रतोलियाजी ने खुद की ओर इशारा किया। अब नौकर तो नौकर ठहरा। उसे तो अपने मालिक का कहा मानना था। उसने सपाट लहजे में कहा - ‘सर! आपका आईसी दिखा दीजिए।’ टोल कर्मचारी का यह कहना था कि कार में मानो भूचाल आ गया। पीठ टिका कर, आराम से बैठे रतोलियाजी उचक कर आगे हुए, जलती आँखों से उसे देखा। सीडी में कैद ‘धीर, गम्भीर, मुलायम’ स्वर, पल भर में ‘असली पुलिसिया स्वर’ बन गया। लाल-भभूका बन चुके रतोलियाजी ने ‘सुस्पष्ट उच्चारण’ से गर्जना की - ‘स्साले! तेरा मेनेजर, तेरा सेठ मेरे सामने खड़ा रहता है और तू पचीस रुपयों के लिए मेरा आईसी माँग रहा है। तेरी ये हिम्मत?’ और जितनी गालियाँ उनके अवचेतन में आईं, तात्कालिक वाद-विवाद प्रतियोगिता के कुशल वक्ता की तरह रतोलियाजी ने धारा प्रवाह रूप से, एक साँस में सुना दीं। रतोलियाजी का ‘भस्म कर देनेवाला’ रूप देख कर और अनगिनत गालियाँ सुनकर टोल कर्मचारी, मानो अपनी जान बचा रहा हो, इस तरह कार से दूर छिटका और हाथ जोड़कर मिमियाते हुए बोला - ‘पहचान गया साब! अब पहचान गया! आप सच्ची में टी आई सा’ब ही हो। सॉरी सर! सॉरी! गलती हो गई।’ उसके बोलते-बोलते ही बेरीयर उठ गया। 

शर्माजी बोले - “हम लोग समझ ही नहीं पाए। रतोलियाजी अच्छे-भले, हँसते-बतियाते बैठे थे। लेकिन पल भर में ही उनका कायान्तरण हो गया। ‘पुलिसिया आत्मा’ से यह क्षणिक साक्षात्कार हम सबके लिए ‘आजीवन अविस्मरणीय संस्मरण निधि’ बन गया। टोल नाके से मीलों दूर निकल जाने के बाद भी हम सब हक्के-बक्के बने रहे। ये तो हमारेवाले, ‘वो’ रतोलियाजी नहीं। हमारी शकलें देख कर, जोर से हँसकर, रतोलियाजी ही हम सबको अपने आप में लाए।”

शर्माजी ये किस्से सुना रहे थे और मुझे इसके समानान्तर ढेबर भाई का एक किस्सा याद आ रहा रहा था। 

यू. एन. ढेबर के नाम से पहचाने जानेवाले ढेबर भाई का पूरा नाम उछरंगराय नवलशंकर ढेबर था। वे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे। सौराष्ट्र राज्य के पहले मुख्य मन्त्री वे ही थे। बाद में काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उसके बाद तीसरी लोक सभा के सदस्य।

जहाँ तक मेरी याददाश्त काम कर रही है, यह बात 1958 की है। मन्दसौर जिला काँग्रेस कमेटी ने, मन्दसौर में ‘सपत्नी सम्मेलन’ आयजित किया था। ढेबर भाई भी उसमें शामिल थे। 

सम्मेलन नूतन स्कूल में आयोजित था। व्यवस्थाओं की
जिम्मेदारी काँग्रेस सेवादल को सौंपी गई थी। सभा-सत्रों में प्रवेश के लिए, आयोजकों द्वारा निर्धारित परिचय-प्रतीक दिखाना अनिवार्य था। एक सत्र में प्रवेश द्वार पर मनासा की सेवादल टुकड़ी तैनात थी। छगन भाई पुरबिया सबके प्रवेश-प्रतीक की खातरी कर रहे थे। तभी ढेबर भाई पहुँचे। वे अन्दर जाने लगे तो छगन भाई ने हाथ बढ़ा कर रोक दिया और कहा - ‘पास दिखाइए भाई साहब!’ ढेबर भाई मुस्कुराए और धीमे से बोले - ‘मैं ढेबर हूँ भाई!’ छगन भाई बोले - ‘जी भाई साहब! मैं जानता हूँ। लेकिन पास दिखाइए।’ ढेबर भाई तनिक भी असहज नहीं हुए। उसी तरह मुस्कुराते हुए बोले - ‘मैं काँग्रेसाध्यक्ष हूँ भाई!’ नजरों से नजर मिलाते हुए छगन भाई ने सपाट स्वर में जवाब दिया - ‘जी भाई साहब! मैं जानता हूँ। आप पास दिखाइए।’ ढेबर भाई के पीछे राष्ट्रीय और प्रान्तीय स्तर के कई नेता पंक्तिबद्ध थे। लेकिन सब चुपचाप देख-सुन रहे। पता नहीं, ढेबर भाई को मजा आ रहा था या वे आजमा रहे थे। बोले - ‘सत्र की अध्यक्षता मुझे ही करनी है भाई! जाने दीजिए।’ छगन भाई, उसी तरह अडिग बने बोले - ‘जी भाई साहब! मुझे मालूम है। लेकिन आप पास दिखाइए।’ इस सम्वाद में मिनिट-डेड़ मिनिट भी नहीं लगा, कोई कुछ नहीं बोला लेकिन सबकी बेचैनी साफ नजर आने लगी। ढेबर भाई ने अनुनय की - ‘सत्र का उद्घाटन मुझे ही करना है। पहला भाषण मुझे ही देना है। मेरे बिना सत्र शुरु नहीं होगा।’ छगन भाई को कुछ फर्क नहीं पड़ा। दुहराया - ‘जी! जानता हूँ भाई साहब! लेकिन आप अपना पास दिखाइए।’ ढेबर भाई की मुस्कान तनिक अधिक चौड़ी हो गई। जेब से अपना पहचान-प्रतीक निकाला। छगन भाई की ओर बढ़ाया। छगन भाई ने ध्यान से देखा। तसल्ली की और हाथ हटा कर विनम्रता से बोले - ‘धन्यवाद। जाइए भाई साहब।’ ढेबर भाई ने मुस्कुराते हुए अपना ‘पास’ जेब में रखा और गर्मजोशी से छगन भाई का कन्धा थपथपाते हुए ‘बहुत बढ़िया! शाबास!’ कहते हुए अन्दर चले गए।

ढेबर भाई के, अन्दर जाने से पहले ही पूरी बात, नूतन स्कूल की दीवारें पार कर चुकी थी। लोग छगन भाई के पास जुट आए। एक ने कहा - ‘ये क्या किया तुमने? ढेबर भाई को जानते नहीं? तुमने पूरी जिला कमेटी का नाश कर दिया। पता नहीं, तुम्हारी इस हरकत का दण्ड किसे झेलना पड़ेगा।’ छगन भाई बोले - ‘मुझे नायकजी ने कहा था कि बिना पास किसी को अन्दर मत जाने देना। मैंने तो आदेश का पालन किया। अब जो होना हो, हो।’ अन्दर, ढेबर भाई ने अपना भाषण शुरु ही इस घटना के उल्लेख से किया। छगन भाई का नाम तो वे नहीं जानते थे। उनका नाम लिए बिना उनकी प्रशंसा की और छगन भाई की टुकड़ी को, राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा दिए जानेवाले सर्वोच्च सम्मान स्वरूप पार्टी का रेशमी झण्डा प्रदान किया।  

पहचान बताने का सबका अपना-अपना तरीका होता है। रतोलियाजी यदि अपना आईसी दिखा देते तो टोल कर्मचारी के सामने टी आई पद की प्रतिष्ठा और रौब नष्ट हो जाता। इसे वह अपनी कामयाबी मानता, लोगों के बीच रस ले-ले कर कहता कि उसने टीआई से उसका आईसी निकलवा लिया। और ढेबर भाई यदि पहचान-पत्र नहीं बताते तो पूरी पार्टी का अनुशासन उसी क्षण ध्वस्त हो जाता है। दोनों ने अपने-अपने पद की प्रतिष्ठा की रक्षा की। एक ने अपनी पहचान बताकर और दूसरे ने अपना पहचान-पत्र बता कर।
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