देखें! कौन अधिक क्रूर! अधिक निर्मम!

पुंजालाल और लोकेश समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें किस अपराध का दण्ड मिला। दोनों सगे भाई हैं। पुंजालाल बड़ा और लोकेश छोटा। बड़ा इक्कीस बरस का और छोटा  बीस बरस का। रतलाम से पचास किलो मीटर दूर, तहसील मुख्यालय बाजना के गाँव सालरडोजा के निवासी हैं। सन् 2007 में बीमारी में पिता चल बसा। 2010 में, मजदूरी करते हुए, एक निर्माणाधीन मकान की दीवार गिरने से माँ दब मरी। तब पुंजालाल चौदह बरस का और लोकेश तेरह बरस का था। स्कूल के उद्घाटन के लिए, 2010 में मुख्यमन्त्री शिवराजसिंह चौहान बाजना पहुँचे। गाँव वालों ने दोनों आदिवासी किशोरों की दशा उनके सामने रखी। द्रवित होकर उदार हृदय मुख्यमन्त्री ने घोषणा की कि दोनों भाइयों की पढ़ाई का खर्चा सरकार उठाएगी और दोनों को पाँच-पाँच हजार रुपये प्रति वर्ष दिए जाएँगे। खूब तालियाँ बजीं। सचित्र समाचार छपे। 

पुंजालाल और लोकेश बहुत खुश हुए। उन्हें लगा, उनके दुःखों का अन्त हो गया है। नई जिन्दगी के रास्ते खुल गए हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि जब वे ऐसा सोच रहे थे तो दुर्देव हँस रहा था। सात बरस हो गए। अब तक कुछ नहीं मिला। पटवारी का कहना है कि उसने तो हाथों-हाथ प्रकरण तहसीलदार को पेश कर दिया था। उसके बाद क्या हुआ, उसे नहीं पता। उसे तो क्या, किसी को कुछ नहीं पता। बात कलेक्टर तक पहुँची तो जवाब मिला - हर बरस नहीं दे सकते। एक बार दे सकते हैं। अधिकतम दस हजार रुपये। दे देंगे। लेकिन वो भी नहीं मिले। 

दोनों भाई पढ़ना चाहते थे। मुख्यमन्त्री की घोषणा ने उनकी चाहत को पंख लगा दिए थे। लेकिन भरोसे में मारे गए। औंधे मुँह जमीन पर आ गिरे। किसी को काई फर्क नहीं पड़ना था। नहीं पड़ा। आदिवासी का मामला है। ऐसा तो होता ही रहता है। न तो पहली बार हुआ न ही आखिरी बार हुआ है। मुख्यमन्त्री की घोषणा के बाद 2014 के विधान सभा चुनाव हो गए। अब 2019 के चुनाव सामने हैं। वे भी हो ही जाएँगे और यदि सब कुछ सामान्य रहा तो शिवराजसिंह एक बार फिर मुख्य मन्त्री बन जाएँगे। लेकिन पुंजालाल और लोकेश तब तक नई घोषणाओं के अम्बार में दब चुके होंगे।

लोकेश पढ़ाई जारी नहीं रख सका। पुंजालाल ने हिम्मत नहीं हारी। कभी मजदूरी की, कभी वेटर का काम किया। बी. ए. कर लिया। अब पी.एस.सी की तैयारी कर रहा है। अब उसे समझ (याने की ‘अकल’) आ गई है। जो भी करना है, उसे ही करना है। सालरडोजा और बाजना में भाजपाई भी हैं और काँग्रेसी भी। सब उसके नाम पर राजनीति करते हैं। मदद कोई नहीं करता। उसकी मदद कर देंगे तो मुद्दा खतम हो जाएगा। वोट नहीं मिलेगा। उसे मदद नहीं मिलेगी तो वोट की रोटी सिकती रहेगी। अफसरशाही/नौकरशाही को तो कभी सोचना ही नहीं था। जब खुद मुख्यमन्त्री को और उनकी पार्टी के लोगों को चिन्ता नहीं तो इन्हें क्या पड़ी है? अनगिनत पुंजालाल और लोकेश मरें या जीएँ, इनके ठेंगे से।

राजनेताओं और अफसरों/नौकरों में कौन सी प्रतियोगिता चल रही है? एक-दूसरे को खुद से अधिक निर्मम, अधिक क्रूर, अधिक गैर जिम्मेदार साबित करने की? एक-दूसरे का उपयोग कर अपना उल्लू सीधा करने की? एक-दूसरे की फजीहत करने की? या फिर यह कि देखें! कौन लोगों को अधिक बेहतर ढंग से ठग सकता है?

प्रधानमन्त्री मोदी ने ‘उज्ज्वला योजना’ शुरु की थी। करोड़ों रुपये इसके प्रचार के लिए खर्च किए गए। इसे मोदी सरकार की युगान्तरकारी, क्रान्तिकारी योजना साबित करनेवाले, पूरे-पूरे पृष्ठों के विज्ञापन अभी भी अखबारों में नजर आते हैं। कहा जाता है कि करोड़ों देहाती गृहिणियों को गीली लकड़ियों के धुँए से मुक्ति दिलाई गई। योजना को इस तरह पेश किया गया मानो देहाती गृहिणियों को सब कुछ मुफ्त में दे दिया गया। लेकिन हकीकत कुछ और ही किस्सा बयान कर रही है। मेरे कस्बे के गैस विक्रेता बता रहे हैं कि उज्ज्वला योजना के सिलेण्डरों की बुकिंग में चालीस प्रशित की कमी आ गई है। सरकार के और गैस विक्रेताओं के कारिन्दे गाँव-गाँव जाकर समझा रहे हैं लेकिन बुकिंग नहीं बढ़ रही। लोग कहते हैं कि एक सिलेण्डर की कीमत आठ सौ रुपये एकमुश्त उनके पास नहीं है। उन्हें सबसीडी की रकम भी नहीं मिल रही। सारी की सारी रकम, गैस कनेक्शन के डिपाजिट की रकम के रुप में काटी जा रही है। याने कि गैस कनेक्शन मुफ्त नहीं है। एक दिक्कत और। गैस एजेन्सियाँ गाँवों में सिलेण्डर नहीं पहुँचातीं। एजेन्सियों के गोदामों से सिलेण्डर उठाने पड़ते हैं। इसमें वक्त भी लगता है और खर्च भी आता है। लिहाजा, एक बार सिलेण्डर लेने के बाद लोग पलट कर नहीं देख रहे। गीली लकड़ियों के धुँए से आँखें मसलते हुए चूल्हा फूँकना उन्हें अधिक अनुकूल लग रहा है। उपलब्धियों के विज्ञापन छप रहे हैं, गीली लकड़ियों का उपयोग बढ़ रहा है, गैस सिलेण्डरों की बुकिंग कम होती जा रही है। ‘उज्ज्वला’ दम तोड़ कर ‘तिमिरा’ बनती जा रही है। लेकिन  न सत्ता को परवाह है न प्रतिपक्ष को और न ही अफसरशाही/नौकरशाही को। कभी किसी मालवी कवि ने कहा था - ‘चलवा दो यो को ढर्रो। खाता रो घूस, पीता रो ठर्रो।’

मुख्यमन्त्री शिवराजसिंह चौहान की भावान्तर योजना इन दिनों खूब चर्चा में है। मुख्यमन्त्री को आकण्ठ विश्वास है कि इस योजना को पूरा देश अपनाएगा। लेकिन जमीनी वास्तविकता मुख्यमन्त्री के विश्वास पर विश्वास नहीं करने दे रही। घोषणा होते ही इसका सीधा अर्थ लगाया गया था - किसान को मिले मूल्य और न्यूनतम मूल्य के अन्तर की रकम किसान को दे दी जाएगी। लेकिन ‘जन्नत की हकीकत’ कुछ और ही निकली। योजना के विस्तृत ब्यौरे सामने आए तो ‘मॉडल मूल्य’ अचानक ही बीच में पैदा हो गया और किसान माथे आ गए। हालत यह हो गई कि जिनके लिए योजना बनी, वे ही फायदा लेने से बिचकने लगे। जिन किसानों ने ‘भागते भूत की लंगोटी भली’ की तर्ज पर योजना कबूल की तो उन्हें समय पर पैसा नहीं मिला। और जब मिला तो गेहूँ का तो मिल गया लेकिन एक महीना बीतने के बाद भी उड़द का नहीं मिला। मण्डी प्रशासन कह रहा कि वह तो देने को उतवाला बैठा है लेकिन किसानों के खातों की जानकारी नहीं मिल रही। देनेवाला उतावला, लेनेवाला उससे ज्यादा उतावला लेकिन भावान्तर है कि टस से मस होने को तैयार नहीं। यहाँ भी न नेता को फर्क पड़ रहा है न अफसरों/नौकरों को। जिसे फर्क पड़ रहा है, उसे पड़ता रहे। कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा तो सनातन से चला आ रहा है। प्रलय तक चलता रहेगा।

लगता है, लोकतन्त्र के दो खम्भों (विधायिका और कर्यपालिका) ने अपनी-अपनी स्वतन्त्र, सार्वभौम दुनिया बना ली है। दोनों में जनविरोधी दुरभिसन्धी हो गई है - ‘तू मुझे जिन्दा रख, मैं तुझे जिन्दा रखूँ।’ दोनों ही अपने समर्थकों के कन्धों पर चढ़कर कुर्सियों पर काबिज हैं और विरोधियों से मिल कर राज कर रहे हैं।

रही बात जनता की तो उसकी क्या परवाह करनी! वह तो है ही इसी काबिल! और हो भी क्यों नहीं? जो लोग बेरोेजगारी, भ्रष्टाचार, रोटी-कपड़ा-मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, विषमता, अन्याय, शोषण जैसे आधारभूत मुद्दों के मुकाबले धर्म, जाति, मन्दिर-मस्जिद, लव जिहाद, तीन तलाक, लव जिहाद जैसी बातों को प्राथमिकता देते हों, इनके लिए मरने-मारने पर उतारू हों, वे इसी दशा के, इसी व्यवहार के काबिल हैं। 

अपना यह वर्तमान हम ही बुन रहे हैं। लेकिन भूल रहे हैं कि यही हमारे बच्चों के भविष्य की नींव भी बन रहा है।
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‘सुबह सवेरे’ (भोपाल), 07 दिसम्बर 2017