कानून का राज: राज का कानून

अपनी रिपोर्ट लिखवाने के लिए भोपाल की बालात्कार पीड़ीता को तीन थानों के चक्कर लगाने पड़े। पूरे चौबीस घण्टों के बाद उसे सफलता मिल पाई। यह, कोई अनोखी घटना नहीं। लेकिन इस मामले में यह महत्वपूर्ण है कि इस बच्ची के माता-पिता, दोनों ही पुलिसकर्मी हैं। तीनों थानों के कर्मचारी भी यह बात जानते ही होंगे। इसके बाद भी, अपने ही सहकर्मी की बेटी की रिपार्ट लिखने को कोई तैयार नहीं हुआ। इंकार करनेवाला प्रत्येक पुलिसकर्मी भली प्रकार जानता रहा ही होगा कि उसके इंकार की सजा उसे मिल सकती है। इसके बाद भी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। इसके पीछे वास्तविक कारण तो इंकार करनेवाले ही जानते होंगे लेकिन एक कारण, कर्मचारियों के मन में बैठा यह भय जरूर रहा होगा कि कोई ‘जबरा आदमी’ इस काण्ड से जुड़ा हुआ निकल आया तो उसकी नौकरी पर बन आएगी। हमारा  कानून शकल देखकर तिलक निकालता है।

वर्णिका कुण्डू का मामला जिस तेजी से उछला था, उससे अधिक तेजी से नेपथ्य में चला गया है। वर्णिका के आईएएस पिता कानून जानते हैं। इसीलिए अपनी हदें भी जानते हैं। कानून ने वर्णिका की कितनी सहायता की, यह भले ही किसी को नजर न आया हो किन्तु कानून के तहत वर्णिका के पिता का तबादला सबको नजर आया। कानून ने अभी अपनी इतनी ही जिम्मेदारी निभाई है। बाकी जिम्मेदारी कैसे निभानी है, यह बाद में देखा जाएगा।   

पत्रकार विनोद वर्मा को पुलिस ने रात तीन बजे उनके दिल्ली स्थित निवास से गिरफ्तार कर लिया। किसी ने उनकी नामजद शिकायत नहीं की, न ही किसी एफआईआर में उनका नाम है और न ही पुलिस, अदालत में उनके विरुद्ध अब तक कोई पुख्ता दस्तावेज पेश कर पाई है। विनोद वर्मा फिलहाल 27 नवम्बर तक न्यायिक हिरासत में हैं। माना जा रहा है कि छत्तीसगढ़ के एक ‘जबरे’ मन्त्री की कोई ऐसी सीडी वर्मा के पास है जिसमें इस मन्त्री के कपड़े उतरे हुए हैं और यह सीडी इस मन्त्री को कुर्सी से उतार सकती है। अन्देशे का मारा कानून स्वस्फूर्त भाव से सक्रिय बना हुआ है।

एक देहाती मेले के उद्घाटन समारोह में रतलाम ग्रामीण विधान सभा क्षेत्र के विधायक ने बन्दूक से हवाई फायर किया। कानून में ऐसा करने की अनुमति नहीं है। लेकिन बन्दूक का धमाका कानून को सुनाई नहीं दिया, न ही अखबार में छपा फोटू और समाचार देखने में आया। यह संयोग ही है कि विधायकजी सत्तारूढ़ दल के हैं। 

कोई आठ-दरस बरस पहले, वेलेण्टाइन डे पर मेरे कस्बे के बजरंगियों ने भारतीय संस्कृति बचाने के पराक्रम में ऐसा कुछ कर दिया था कि उनमें से कुछ को पुलिस ने थाने में बैठा लिया। मेरे प्रिय मित्र विष्णु त्रिपाठी तब भाजपा के प्रभावशाली नेता हुआ करते थे। कानून को समझाने में उन्हें थोड़ी मेहनत करनी पड़ी। देर शाम वे कानून को भरोसा दिलाने में कामयाब हो पाए कि ‘कुछ अज्ञात असामाजिक तत्व’ प्रदर्शन में घुस आए थे और उन्हीं ने वह पराक्रम किया था जो बजरंगियों के खाते में जमा किया जा रहा था। और सारे पराक्रमी थाने से बाहर आ गए।

पूर्व केन्द्रीय मन्त्री यशवन्त सिन्हा ने अपनी ही पार्टी को ‘भई गति साँप, छछूंदर केरी’ वाली दशा में खड़ा कर रखा है। पार्टी न निगल पा रही न उगल पा रही। पेरेडाइज पेपर्स में जयन्त सिन्हा के नामोल्लेख ने (यशवन्त) सिन्हा-संतप्तों को मानो संजीवनी बूटी दे दी - बेटे के नाम पर बाप की बोलती बन्द की जा सकेगी। लेकिन एक बेटे के बाप ने दूसरे बाप को उसका बेटा याद दिला दिया। याद दिलाया कि कानून तो सबके लिए एक जैसा होता है। इसलिए ‘पेरेडाइज’ में जगह पानेवाले जयन्त की जाँच के साथ ही, 50 हजार को, चुटकियों में सोलह हजार गुना के पेरेडाइज में बदलने वाले ‘जादूगर-जय’ भी जाँच होनी चाहिए। यशवन्ती-माँग ने कानून को उहापोह में डाल दिया है - ‘माँग सुने या न सुने?’ सुने तो अपनी भी जाँघ उघड़ जाए। न सुने तो बूमरेंग की चोट सहनी पड़े। फिलहाल कानून, अपनी लैंगिक पहचान छुपाए, दुम दबाकर कन्दरा में बैठ गया है। 

अपनी ईमानदारी और कानूनपेक्षी आचरण के लिए ख्यात, हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका एक बार फिर स्थानान्तरित कर दिए गए हैं। छब्बीस बरस की नौकरी में यह उनका इक्यावनवाँ तबादला है। याने प्रति छः माह में एक। सरकार काँग्रेसी रही हो या भाजपाई, सबने कानूनी व्यवस्था के अनुसार ही उनका तबादला किया। सारी पार्टियाँ उनकी मुक्त कण्ठ प्रशंसक रही हैं - काँग्रेसी सरकारों में भाजपा और भाजपा सरकारों में काँग्रेस। कानून का सन्देश - जिस अफसर की ईमानादरी की प्रशंसक तमाम पार्टियाँ हों, उसका तबदला हर छः महीनों में किया ही जाना चाहिए। जिनका ऐसा तबादला नहीं किया जाता, उनके (पाक-साफ होने के) बारे में कानून कुछ नहीं कह कर सब कुछ कह देता है। कानून की यही खूबी है।

दरअसल सारा झगड़ा ‘कानून का राज’ और ‘राज का कानून’ को लेकर है। कानून का राज किसी राज को नहीं सुहाता और राज का कानून राज के सिवाय किसी और को नहीं सुहाता। राज के लाभार्थी प्रत्येक समय में मौजूद रहते हैं। परम मुदित मन और अन्ध-भक्ति-भाव से राज के कानून की हिमायत करते रहते हैं। हमारा ‘लोक’ इनसे हर काल में त्रस्त रहता है और इन्हें चाटुकार, चमचे, चापलूस कहता है। कानून का राज चलाने में चैन की नींद सोया जा सकता है, लोक-यश अर्जित किया जा सकता है, दुआएँ ली जा सकती हैं। लेकिन राज की स्वार्थपूर्ति नहीं हो पाती, अपनों को उपकृत नहीं किया जा सकता, मनमानी नहीं की जा सकती। तब ‘राज’ आत्म-मुग्ध हो, उच्छृंखल, उन्मादी, उन्मत्त हो, पागल हाथी की तरह अपनों को ही रौंदने लगता है। इसीलिए हमारा ‘लोक’ लौह महिला इन्दिरा गाँधी, उदार दक्षिणपंथी अटलबिहारी वाजपेयी, सन्त राजनेता मनमोहनसिंह को कूड़े के ढेर पर फेंक देता है। तब राज को सौ जूते भी खाने पड़ते हैं और सौ प्याज भी - जैसा कि अभी-अभी हमने जीएसटी के मामले में देखा है। राज का कानून अपनी ही संस्थाओं की खिल्ली उड़वाता है। सीबीआई कभी काँग्रेस का तो कभी भाजपा का तोता कही जाती है। चुनाव आयोग लोक-उपहास का पात्र बन जाता है। राज का कानून हर बार साबित करता है कि कानून का राज ही एक मात्र और अन्तिम उपाय है। किन्तु वह राज ही क्या जो पथ-भ्रष्ट और मद-मस्त न कर दे! सेवक-भाव सहित राज सिंहासन पर बैठने से पहले चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करना पड़ता है। वर्ना, सम्पूर्ण सत्ता तो सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती ही है। करेगी ही।

जानते तो सब हैं लेकिन कबूल कोई नहीं करता। कोई नहीं मानता। इसीलिए ‘लोक’ सनातन से चेतावनी देता चला आ रहा है - ‘किस मुगालते में हो? राज तो रामजी का भी नहीं रहा और घमण्ड कंस का भी नहीं रहा।’ 

लेकिन कानून का राज हमें भी तो नहीं सुहाता! उसके लिए हम भी तो कीमत चुकाने को तैयार नहीं। और बिना कीमत चुकाए कुछ मिलता नहीं। हम लोग बिना कीमत चुकाए सब कुछ हासिल कर लेना चाहते हैं। इसीलिए हमें कुछ भी हासिल नहीं हो रहा। अपनी यह नियति हमने ही तय की है।
हम सब, अपने खाली हाथों के लिए दूसरों को कोसने में माहिर हैं। इसी में व्यस्त भी हैं और इसी में मस्त भी। लोकतन्त्र में ‘नागरिक’ खुद अपना राजा होता है। लेकिन हम ‘प्रजा’ बन कर खुश हैं। हम ‘नागरिक’ बनेंगे तो ही कानून का राज आ पाएगा। हम कानून के राज में जीएँ या राज के कानून में, यह हमें ही तय करना है
-----


(दैनिक ‘सुबह सवेरे’, भोपाल, 16 नवम्बर 2017)