उन्हें सवाई-ड्योड़ी मौत मिली

13 मई 2018 रविवार। हर दिन की तरह एक सामान्य दिन। रोज की तरह दादा उठे। नौ बजे तक तैयार हो गए। आज उन्हें एक पेट्रोल पम्प के उद्घाटन में जाना है।

घर में कुल तीन लोग हैं - दादा, बड़ा बेटा मुन्ना और परिचारक भूरा। बहू सोना, राजसमन्द गई है, बेटी (याने दादा की पोती) रौनक के पास। वह वहाँ जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी है। बहू सोना आज आ रही है। वह उदयपुर आ जाएगी। मुन्ना उसे लेने उदयपुर जाएगा। 

दादा सलीम कुरेशी को फोन करते हैं - ‘वक्त पर आ जाना। साढ़े ग्यारह बजे उद्घाटन है। मैं तैयार बैठा हूँ।’ मल्हारगढ़-नीमच फोर लेन पर, ग्राम चंगेरा में एक पेट्रोल पम्प का उद्घाटन है। कार्यक्रम में जाना तो बहुत पहले से तय था लेकिन उन्हें कल ही मालूम हुआ कि उद्घाटन उन्हें ही करना है। वे मना कर ही नहीं सकते थे। पेट्रोल पम्प बाबू सलीम चौपदार का है और बाबू किसी परिजन से कम नहीं। दादा को देर से पहुँचना पसन्द नहीं। कोई आए न आए, कार्यक्रम भले ही देर से शुरु हो, वे समय से पहले ही पहुँचते हैं। आदत है उनकी।

दस बज कर पाँच मिनिट हो गए हैं। दादा अधीर हो गए हैं। अब तक तो उन्हें निकल जाना चाहिए था। लेकिन उन्हें ले जानेवाले  अब तक नहीं आए। वे फोन लगाने की सोचते हैं। लेकिन फोन लगाएँ, उससे पहले ही कार दरवाजे पर आ जाती है।  चन्द्रशेखर पालीवाल, मंगेश संघई, सलीम कुरेशी और ओम रावत उतरते हैं। चन्द्रशेखर मनासा ब्लॉक काँग्रस अध्यक्ष है और मंगेश जिला काँग्रेस उपाध्यक्ष। दादा उठ खड़े होते हैं - ‘चलो भई! चलो। अपन लेट हो गए हैं।’ चारों में से कोई एक कहता है - ‘प्रोग्राम साढ़े ग्यारह बजे है। अपन घण्टे भर में ही पहुँच जाएँगे। लेट नहीं होंगे।’ दादा कुछ नहीं बोलते। वे ड्रायवर के पासवाली सीट पर बैठ चुके हैं। हाथ से इशारा करते हैं - चलो। कार चल पड़ती है।

दादा के जाने के कोई दो घण्टे बाद मुन्ना भी उदयपुर के लिए निकल जाता है। दोनों बाप-बेटे पहले ही तय कर चुके हैं - सम्भव हुआ तो मुन्ना और सोना, दादा की वापसी के समय तक नीमच पहुँच जाएँगे और सब साथ-साथ मनासा आएँगे। 

सवा ग्यारह बजे दादा पेट्रोल पम्प पर पहुँचते हैं। लोग दादा की आदत जानते हैं। सो, काफी लोग पहुँच चुके हैं। बाबू भाई उनकी अगवानी करते हैं। 

साढ़े ग्यारह बजे कार्यक्रम शुरु होता है। दादा से आग्रह किया जाता है - मंच पर आने का। वे मना कर देते हैं। उन्हें मंच पर चढ़ने में तकलीफ होती है। फौरन तय होता है - मंच पर कोई नहीं बैठेगा। सब दादा के साथ, मंच के नीचे ही बैठेंगे। दादा तो मंच पर नहीं गए। मंच ही नीचे आ गया।

तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक दादा से उद्बोधन का अनुरोध होता है। दादा माइक सम्हालते हैं। अपनी चिर-परिचित शैली में, लगभग तीस मिनिट में अपनी बात कहते हैं। बाबू सलीम के परिवार से अपने नाते का विस्तृत ब्यौरा देते हुए उन्हें और उनके परिवार को असीसते हैं। धन्धे में मधुर व्यवहार, नैतिकता, पारदर्शिता, ईमानदारी बरतने की, आैर ग्राहकों को दिए जाने वाले बिलों पर हिन्‍दी में हस्‍ताक्षर करने की आग्रहभरी सलाह देते हैं। यह सब करते हुए मीठी चुटकियाँ लेते हैं। लोगों को गुदगुदी होती है। ठहाके लगते हैं। बार-बार तालियाँ बजती हैं।
पेट्रोल पम्प उद्घाटन समारोह में बोलते हुए दादा (चित्र - बाबू भाई चोपदार की फेस बुक वाल से)

दादा फीता काटते हैं। कार्यक्रम समाप्त होता है। भोजन शुरु हो जाता है। दादा की मनुहार होती है। वे भोजन से इंकार कर देते हैं। एक मनुहार होती है - ‘थोड़े से दाल-चाँवल तो चलेंगे।’ दादा हाँ भर देते हैं। प्लेट आ जाती है। दादा प्रेमपूर्वक भोजन करते हैं।

ढाई बज गए हैं। गर्मी चरम पर है। मुन्ना और सोना अब तक नहीं आए हैं। दादा रवाना हो रहे हैं। लोग उन्हें बिदा करने कार तक आते हैं। दादा, ड्रायवर के पासवाली सीट पर बैठते हैं। नमस्कार करते हुए सबसे कहते हैं - ‘आप लोग भी जल्दी से जल्दी अपने-अपने मुकाम पर पहुँचो और आराम करो। गरमी बहुत तेज है।’ 

लगभग साढ़े तीन बजे दादा अपने निवास पर पहुँचते हैं। चन्द्रशेखर, मंगेश, सलीम और ओम जाने की इजाजत माँगते हैं। दादा उन्हें रोकते हैं - ‘ऐसे कैसे? पानी पीकर जाओ।’ वे भूरा को आवाज लगाते हैं - ‘भूरा! इन्हें दो-दो गिलास पानी पिलाना। इन्होंने आज बहुत श्रीखण्ड खाया है।’ चारों हँसते हैं। पानी पीते हैं। दादा चारों को बिदा करते हैं - ‘अब जाओ। तुम भी आराम करो। मैं भी आराम करूँगा।’

दादा अपने कमरे में आते हैं। कुर्ता बदल कर लेट जाते हैं। साढ़े चार बजे उठते हैं। मुन्ना को फोन लगाते हैं - ‘कहाँ हो तुम लोग?’ मुन्ना बताता है कि वे मंगलवाड़ चौराहा पार कर चुके हैं। दादा कहते हैं - ‘मैं घर आ गया हूँ। आराम कर लिया है। अब चाय पीयूँगा। तुम लोग तसल्ली से आना। जल्दी मत करना।’ फोन बन्द कर वे भूरा से चाय के लिए कहते हैं और दाहिनी हथेली पर सर टिका कर, दाहिनी करवट पर लेट जाते हैं।

दादा ग्रीन टी पीते हैं। बनाने में कोई देर नहीं लगती।
मुश्किल से पाँच मिनिट होते हैं कि भूरा चाय लेकर पहुँचता है। देखता है, दादा सो रहे हैं। वह ‘पापाजी! पापाजी!!’ की आवाज लगाता है। कोई जवाब नहीं मिलता। उसे लगता है, दादा थक गए हैं। गहरी नींद में हैं। वह वापस चला जाता है। कोई दस मिनिट बाद फिर चाय बनाकर लाता है और दादा को आवाज लगाता है-एक बार, दो बार, तीन बार। दादा जवाब नहीं देते हैं। वह उन्हें हिलाता है। दादा फिर भी न तो कुछ बोलते हैं न ही आँखें खोलते हैं। भूरा घबरा जाता है। रोने लगता है। इसी दशा में मुन्ना को फोन कर सब कुछ बताता है। मुन्ना कहता है -‘पापा को हिला।’ भूरा कहता है, वह सब कुछ कर चुका। मुन्ना इस समय निम्बाहेड़ा के आसपास है। वह फौरन डॉक्टर मनोज संघई को फोन लगाता है - ‘जल्दी पापा को देखो। वे बोल नहीं रहे। लगता है, उनकी शुगर कम हो गई है।’ मनोज भाग कर दादा के पास पहुँचता है। दादा को टटोलता है। वह पाता है - अब दादा की केवल देह वहाँ है। दादा नहीं। 

मनोज, मुन्ना को फोन करता है - ‘दादा चले गए मुन्ना भैया। आप जल्दी चले आओ।’ मुन्ना गाड़ी चला रहा है। एक पल उसके हाथ काँपते हैं। लेकिन वह खुद को संयत करने की कोशिश करते हुए, भर्राई आवाज में सोना से कहता है - ‘पापा चले गए सोनू! सबको फोन करो।’ सोना पर मानो पहाड़ टूट पड़ता है। वह रोने लगती है। मुन्ना कहता है - ‘मैं गाड़ी चला रहा हूँ। फोन नहीं कर सकता। तुम फोन करो।’ रोते-रोते ही सोना एक के बाद एक परिजनों को फोन लगाती है और रोते-रोते हम सबको खबर करती है। 

सात-सवा सात बजे मुन्ना घर पहुँचता है। देखता है, अपनी दाहिनी हथेली पर माथ टिकाए दादा, दाहिनी करवट लेटे हुए हैं। रोज की तरह। मानो अभी उठ जाएँगे और कहेंगे - ‘मेरी चाय लाओ।’

दादा ‘अकस्मात मृत्यु’ की बातें किया करते थे। लगता है, उन्होंने कभी एकान्त में ईश्वर से अकस्मात मृत्यु माँगी होगी। ईश्वर ने उनकी कामना सवाई-ड्योड़ी पूरी की। केवल अकस्मात मृत्यु नहीं दी। निःशब्द, एकान्त, अकस्मात मृत्यु दी। अन्तिम समय में वे थे और उनका ईश्वर उनके पास था। उनसे बतिया रहा था।
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